जिंदगी एक खुली किताब -चाँदनी झा/JINDAGI EK KHULI KITAB-CHANDANI JHA

"जिंदगी एक खुली किताब" 


जिंदगी क्या है?  सबके मन में यह सवाल उठता है, जब हम जन्म लेते हैं, बच्चे होते हैं, कुछ ज्यादा दुख चिंताएं नहीं होती। बस खेलने खाने की चिंता, भरपूर नींद, एक तेज दौड़, हमेशा सकारात्मक सोच के साथ। बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं । इस अवस्था में हम, परिवार के माहौल, माता-पिता का हमारे प्रति व्यवहार ,सामाजिक वातावरण स्कूल का प्रभाव पड़ता है । नए-नए दोस्त बनते, यही उम्र है जहां कई नए विचार पनपते हैं। कुछ करने का जज्बा ,हंसी, प्रेम बदला कुछ अलग करने की तमन्ना, कुछ हटके करने का जज्बा। और हम अपनी जिंदगी की दौड़ में बढ़ते जाते, जहां जिंदगी को समझना शुरू करते हैं ।और इनसे पहले हमें पता भी नहीं होता कि जिंदगी मौत का ही एक हिस्सा है। हमारी आखिरी मंजिल मौत है। परंतु जिंदगी जो रोज गुजर रही है  यह रास्ता है। और हम रास्ते पर सही से चले, इससे जानना होता है। हम अपने कैरियर ,नाम प्रसिद्धि ,परिवार अपने सपनों के साथ हम चलते हैं .।हमारी  नींव हमारे घर से शुरू हो जाता है ।सबको लगता है शायद छोटी-छोटी चीजें प्रभावित नहीं करती परवरिश को। पर गलत, हर छोटी-छोटी चीज हमारे मानसिकता को हमारे विकास को प्रभावित करती है। 
 हमें अभी के भागदौड़ जिंदगी में, सबसे पहले जिंदगी की अहमियत, जिंदगी के मकसद को समझना होगा। बच्चों को बचपन से ही तैयार करना होगा। सफलता के साथ  और असफलता के साथ जीना। सफलता और असफलता हमारे जिंदगी का हिस्सा है ।हम लड़े जीतें, लेकिन यदि हार जाए तो टूटे नहीं। यह ज्ञान देना ही होगा। समाज और शिक्षा में नैतिकता को जोड़कर समाज को समझना होगा ,हम लोगों के कामयाबी पर शाबाशी दे ,  तो उनकी आसफलता पर हौसला दे। और किसी भी परिस्थिति में उन पर हंसे नहीं ।और हमें अपने बच्चों को भी  बताना होगा जो हम पर हंस रहे हमें भी उन पर हँसना है । ना कि अपने हौसलों को कमजोर करना है ।इस तरह समाज में हर पहलू से अवगत कराएंगे ,तो हमारे बच्चे समय के साथ हर परिस्थिति में भी जी  सकेंगे। खुद को हर माहौल में ढाल पाएंगे। अच्छी शिक्षा के साथ, हर परिस्थिति में खुद को कैसे संभाले यह सिखाना होगा। हद तक यह सच है कि जरूरी नहीं कि उम्र के बाद बच्चे अपने सिवा किसी और के बातों से सहमत हो। लेकिन बचपन से देखा गया महसूस किया गया असर लाता है। मैंने खुद भी और अपने बच्चों के साथ महसूस किया है ।मुझे ऐसा नहीं करना है, मम्मी ने ऐसा करने से मना किया है ऐसे सवाल हमारे मन में हमेशा आते हैं।  यदि हम अपने बच्चों से कहते हैं तुम ऐसा कर रहे लोग को पता लगेगा तो क्या होगा? ऐसा कह कर हम समाज से उसे डराने लगते हैं। गलतियां इंसान से होती है  यह हमारे जीवन का हिस्सा है, पर इन गलतियों के कारण हम समाजसे मुँह न छुपाये। हकीकत के साथ यदि समाज जीना सीख जाएगा तो, उसे अपनी कमियों के कारण शर्मिंदा ना होना पड़ेगा। हम खुली किताब की तरह जियें ये जरूरी है। डर नहीं रहेगा कि कोई हमारा राज जान जाएगा। अपने आप को झूठे दिखावे के लिए ना बदले ।खुद के अस्तित्व को स्वीकार कर ।हकीकत के साथ में जीना सीखना होगा। हर तरफ सकारात्मक भाव, किसी को कम ना समझो, या खुद को बहुत ज्यादा ना माने। हमें महत्वाकांक्षी ,सवलम्बी, दृढ़ संकलपी, स्वाभिमानी होना चाहिए,पर सबसे पहलेपूर्ण मानव। जिसकी कोई सीमा नहीं होती। उसके लिए तत्कालिक परिस्थिति के अनुसार जीवन जीना होता है ।हमें सीखना है मानवता के साथ जीना।
 आप गलती ना करो यह  कहना गलत है ,लोग हंसेंगे यह बात हम भूल जाए और वास्तविक जीवन  जियें। इसमें ना कोई प्रतियोगिता ना कोई दौड़ । "सबकी अपनी मंजिल अपनी दौड़" होगी । हम अच्छे हैं हम बुरे हैं सबके सामने हैं। दोहरा चरित्र तनाव और अवसाद उत्पन्न करता है। हम जिंदगी को जिंदगी समझ कर जिए। जिंदगी का अर्थ जीवन ना देता है दर्द। गीत है जीवन, आप सबके सामने ऐसे ही रहे जैसे हैं । खुलकर हँसें  खुलकर रोए । हम कभी रोते हैं तो कहा जाता मत रोए, लोग देख रहे हैं। पर अंदर ही अंदर घुटन को रोकने के लिए समाज में छोड़ दिया जाता। आप को मजबूर किया जाता है। आप दिखावे की जिंदगी जियें । एक आदमी आत्महत्या करता या गलत राह चला जाता, पर प्रभावित सारा समाज होता है।
 इसलिए एक को ही नहीं सबको सोच बदलनी होगी। सबको अपने लिए नहीं सबके लिए जीना होगा। सभी के भावनाओं का ख्याल रखना होगा। कुछ न छिपाएं ,हर बात बताएं ताकि आप तनाव में ना रहे ।जरूरत है खुलकर जीने का। खुली किताब, ताकि हर कोई आप को पढ़कर आपको समझ सके। निजी जिंदगी से लेकर समाजिक जिंदगी में ईमानदारी से जीना होगा। धोखा छलावा पल भर का सुकून दे सकता है ,पर आगे हम कुंठित होते हैं ।हताशा निराशा जैसी चीजें घर से शुरू होती है ।दबाव, दिखावा, छलावा ,इसका जड़ हमारी शिक्षा, हमारा घर है ऐसा नहीं है जो लोग गलत करते हैं, उनकी परवरिश बुरी होती है । यानी  गलत तरीके से, पर यह सच है अच्छा करने वालों की परवरिश निश्चित ही अच्छी होती है। इसलिए हम हमेशा हकीकत के साथ जियें।  कभी भी गलत या शार्ट रास्ता ना चुने। जिंदगी जीने के लिए है, ना कि खोने के लिए। गलत ना करें। जिंदगी को जियें बिल्कुल खुली किताब की तरह। स्वतंत्र ,उन्मुक्त आप खुश रहेंगे। लोगों की सुने लोगों को सुनाएं । क्योंकि जिंदगी में जिंदगी से ज्यादा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। हम खुद के लिए, अपने परिवार के लिए महत्वपूर्ण है हमें यह जानना होगा। हमारा महत्व है तभी हमारा जन्म हुआ है। हम अपनों के लिए महत्वपूर्ण है ।इस बात को समझते हुए हमें अपनी जिंदगी में रंग भरने होंगे। मुश्किल हालात से लड़ना सीखना होगा। पाप -पुण्य नहीं सही गलत का फर्क स्पष्ट रुप से समझना होगा। हमें जिंदगी में जीने के लिए जिंदगी को जीना ही होगा ।खुली किताब की तरह जहां कोई भी रंग छुपा ना हो ।

–चाँदनी झा बिहार, भारत

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8 Comments

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    1. बहुत ही शानदार लेख है जी धन्यवाद

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  2. बहुत अच्छे।👌👌👌

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  3. बहुत बढ़िया, जिंदगी की वास्तविक रूप रेखा को बताने का प्रयास किये हैं ?

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