कानून का उद्देश्य न्याय है, वैमनस्य नहीं
पहचान से ऊपर इंसानियत और अधिकारों के साथ जिम्मेदारी—
यही भारत की असली ताक़त है।अगर किसी देश में जातियाँ जीतने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि वहाँ राष्ट्र की एकता हारने लगी है। भारत की आत्मा विविधता में एकता है, न कि विभाजन में सत्ता। संविधान ने हर नागरिक को समान अधिकार दिए हैं, पर उसका उद्देश्य समाज को बाँटना नहीं, जोड़ना था।
आज समस्या यह नहीं है कि कानून जातिभेद करता है, बल्कि समस्या यह है कि कुछ उत्प्रेरक कानूनों का दुरुपयोग कर नादान लोग वैमनस्य को हथियार बना रहे हैं। न्याय की आड़ में निजी स्वार्थ, प्रतिशोध और अहंकार को वैधता दिलाने का प्रयास हो रहा है। इरादतन या बे-इरादतन आरोप, संवाद की जगह टकराव को जन्म दे रहे हैं।
कानून का उद्देश्य संरक्षण होना चाहिए, उत्पीड़न नहीं। जब संवेदनशील प्रावधान समझ और विवेक के बिना प्रयोग किए जाते हैं, तब वे समाज को सुरक्षा नहीं, संदेह और भय देते हैं। इससे न पीड़ित को न्याय मिलता है, न निर्दोष को सम्मान।
भारत तब मजबूत होगा जब पहचान से ऊपर इंसानियत होगी, और अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी चलेगी। जाति अगर राजनीति का साधन बन गई, तो जीत किसी की नहीं होगी—हार सिर्फ भारत की होगी।
Dr Vandana Pandey


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