छिद्रान्वेषण : दूसरों में दोष खोजने की आदत
यह मनुष्य की एक सामान्य लेकिन घातक प्रवृत्ति है—दूसरों में कमियाँ ढूँढ़ना। इसी प्रवृत्ति को छिद्रान्वेषण कहा जाता है। जो लोग इस आदत वाले होते हैं, वे अपने भीतर मौजूद बड़े-बड़े दोषों को भी देखने का साहस नहीं कर पाते, लेकिन दूसरों की छोटी-सी भूल को भी बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते रहते हैं।
दोष खोजने की यह मानसिकता केवल व्यक्ति विशेष को ही नहीं, पूरे समाज को नुकसान पहुँचाती है। इससे समाज में ईर्ष्या, द्वेष और आपसी कटुता जन्म लेती है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है, जो ईमानदारी और निष्ठा से समाज और देश की सेवा करना चाहते हैं। ऐसे लोग निरर्थक आलोचना से हतोत्साहित हो जाते हैं।
आमतौर पर छिद्रान्वेषण वही लोग करते हैं, जिनके भीतर स्वयं अनेक अवगुण होते हैं। दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ने में उनकी सकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती रहती है और उनका स्वयं का विकास रुक जाता है। चाणक्य भी कहते हैं कि यह प्रवृत्ति मनुष्य के भीतर सद्गुणों के विकास को कभी पनपने नहीं देती। परिणामस्वरूप व्यक्ति का मन, वाणी और कर्म तीनों दूषित हो जाते हैं।
महाभारत का दुर्योधन इस दुष्प्रवृत्ति का सबसे बड़ा उदाहरण है। उसने कभी अपने दोषों पर विचार नहीं किया, बल्कि सदा दूसरों की कमियाँ ही देखता रहा। यही कारण था कि उसके विचार, वचन और कर्म सभी अशुद्ध हो गए। एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने दुर्योधन और युधिष्ठिर को राज्य में जाकर साधु पुरुषों की खोज करने भेजा। दुर्योधन को एक भी साधु व्यक्ति नहीं मिला, क्योंकि उसकी दृष्टि दोषों से भरी थी। इसके विपरीत युधिष्ठिर को कोई दुर्जन नहीं मिला, क्योंकि उसकी दृष्टि गुणों पर केंद्रित थी।
वास्तव में, दूसरों के दोष देखने का अधिकार उसी को है, जो स्वयं दोषरहित होने का प्रयास करता है। जो व्यक्ति अपने भीतर झाँकना सीख लेता है, वही सच्चे अर्थों में समाज का मार्गदर्शक बन सकता है।


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