संसार : चरित्र-निर्माण की विराट साधनभूमि
संसार न तो शुभ है, न अशुभ। वह स्वयं में पूर्ण, संतुलित और निर्विकार है। मनुष्य अपनी चेतना, मनःस्थिति और दृष्टि के अनुसार ही उसे अर्थ देता है। जिस अंतःकरण में शांति का दीप प्रज्वलित है, उसे यही संसार सुहावना प्रतीत होता है और जिस मन में द्वंद्व व असंतोष का अंधकार है, उसे वही संसार कठोर और निष्ठुर जान पड़ता है।
अग्नि का स्वरूप इस सत्य को सरलता से उद्घाटित करता है। वह न कल्याणकारी है, न विनाशकारी। शीत में वह जीवन का संबल बनती है और असावधानी में वही पीड़ा का कारण हो जाती है। दोष अग्नि का नहीं, हमारे उपयोग और परिस्थिति का होता है। संसार भी ठीक इसी प्रकार हमारे भावबोध के अनुसार अपना रूप धारण करता है।
यह जगत अपने आप में समर्थ और संपूर्ण है। उसमें समस्त प्रयोजनों की पूर्ति की सामर्थ्य निहित है। यह मान लेना भ्रांति है कि संसार हमारी उपस्थिति से चलता है या हमारी सहायता का अभिलाषी है। हमारे बिना भी इसका प्रवाह अक्षुण्ण रहता है और रहेगा।
तथापि मनुष्य का धर्म कर्म में ही निहित है। परोपकार कोई दायित्व नहीं, अपितु सौभाग्य है। दूसरों की सहायता कर हम संसार का नहीं, स्वयं का परिष्कार करते हैं। सेवा से हमारा चित्त शुद्ध होता है, अहंकार क्षीण होता है और आत्मा का विस्तार होता है।
दान देते समय ऊँच-नीच का भाव नहीं होना चाहिए। यह स्मरण रहे कि हम किसी पर उपकार नहीं कर रहे, बल्कि जीवन हमें देने का अवसर प्रदान कर रहा है। वास्तव में पाने वाला नहीं, देने वाला ही समृद्ध होता है, क्योंकि दान से मनुष्य भीतर से पूर्णता की ओर अग्रसर होता है।
यह संसार न मेरी सहायता का आकांक्षी है, न तुम्हारी। फिर भी निरंतर कर्म करते रहना, सेवा-पथ पर अग्रसर रहना आवश्यक है, क्योंकि यही कर्म हमारे व्यक्तित्व को गढ़ते हैं। यह जगत वास्तव में चरित्र-निर्माण की वह विराट साधनभूमि है, जहाँ प्रत्येक अनुभव हमें अधिक दृढ़, अधिक संवेदनशील और अधिक मनुष्य बनने का अवसर प्रदान करता है।


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