मेरी भूटान यात्रा भाग– एक/Meri Bhutan Yatra bhag -1

 मेरी भूटान यात्रा भाग– एक

नमस्कार मित्रों,


आज मैं आपको अपने भूटान के अविस्मरणीय यात्रा का वृतांत साझा करने जा रही हूं। इस संदर्भ में मैं आपको अवगत कराना चाहूंगी कि हमारे पारिवारिक मित्र अनिल कुमार डोंगरा जिनका संबंध जम्मू से है और जिनकी धर्मपत्नी श्रीमती प्रफुल्ला  टोप्पो हमारे विकासखंड अकलतरा जिला जांजगीर चांपा (छत्तीसगढ़) में माध्यमिक शाला कापन में पदस्थ है ,उन्होंने फरवरी माह में भूटान की यात्रा की थी  और वापस अकलतरा आ कर  हमसे भूटान संबंधी अपने अनुभव साझा कर मई महीने में टोप्पो मैडम को लेकर पुनः भूटान जाने की अपनी इच्छा जताई तो हम सब भी उक्त यात्रा में जाने हेतु  अपनी रजामंदी दे दी। अनिल सर द्वारा ही चार परिवार के कुल 10 व्यक्तियों  के लिए 4रातों और तीन दिनों की बुकिंग सिक्कीम के गंगटोक में रहने वाली चीज़न मैडम के माध्यम से करवा दिया गया जो उनकी पूर्व परिचित मित्र थीं।  हमारी बुकिंग ग्यारह तारीख से 14 तारीख तक तय कर दी गई थी। जिसमे वहां के होटल्स की बुकिंग , गाइड व वाहन भी सम्मिलित थे यानी की भूटान का पूरा पैकेज तैयार था।


हम सब अपनी पहली विदेश यात्रा को लेकर काफी उत्साहित थे और इस हेतु हम सबने खूब खरीदारी भी की थी।

09 तारीख को निर्वाचन समाप्ति के उपरांत अंततः वह दिन भी आ गया जब हम। सब अपने सामान बांध कर 10 तारीख को  दिन के 10:30 में साऊथ  बिहार एक्सप्रेस से  टाटानगर को रवाना हुए जो लगभग रात के 10:20 मिनट पर टटगनगर पहुंची। तीन घंटे के इंतजार के बाद लगभग 1:15मिनट पर हमारी अगली एक्सप्रेस न्यू तिनसुकिया एक्सप्रेस से हम जलपाईगुड़ी के लिए अपने अगले सफर के लिए रवाना हो गए। इस एक्सप्रेस की खूबी यह है की यह नाममात्र की एक्सप्रेस है यह एक लोकल गाड़ी की तरह यहां के लोगों के लिए है जिसमे हजारों की संख्या में रोज लोग एक दूसरे पर लद - लद कर सफर करते हैं। मैने लद कर शब्द का इस्तमाल इसलिए किया क्योंकि यह गाड़ी रात को  चलती है और सारे मजदूर इसी गाड़ी में सोते हुए सफर करते हैं जिन्हे किसी बात का होश नही रहता ये एक के ऊपर एक लदकर सोए हुए होते है आरक्षित सीटों पर भी यहां तक कि रेल के फर्श पर भी।

रेल पर पैर रखने की जगह नहीं होती  भूटान यात्रा की खुशी जितनी अधिक थी इस ट्रेन पर यात्रा करने का दर्द भी उतना ही था। जब हम सब ने ट्रेन पर पैर रखा तो हम भौचक्के रह गए की हम कहां अपने पैरों को रखते हुए आगे बढ़ें।क्योंकि लोगों ने पूरी तरह ट्रेन के फर्श पर कब्जा कर रखा था ।हम बमुश्किल आगे बढ़ रहे थे ।आगे बढ़ते हुए  हमने पाया कि एक महिला अपने द्वारा आरक्षित कराए गए सीट हेतु लड़ रही थी किंतु लोग उसे देने हेतु तत्पर नही थे। यह जानकर हम भी अनेक संभावनाओं के तानेबाने बुनते हुए अपने सीट की ओर बढ़ रहे थे। सीट  आने पर हमने पाया कि हमारे भी सीटों पर लोगों ने कब्जा किया हुआ था प्रत्येक सीट पर दो लोग सोए हुए थे।पर हमारी साथी प्रफुल्ला मैडम ने अपने साहस का परिचय देते हुए  उन लोगों को स्थान छोड़ने हेतु कहा और उन लोगों ने भी कहने मात्र से सीट छोड़कर अपनी भद्रता का परिचय दिया। 

 15घंटे की अपनी यात्रा के उपरांत हम अंततः लगभग 2:25मिनट में न्यू जलपाईगुड़ी पहुंच गए। यही वह स्थान था जहां से हमें भूटान की ओर अग्रसर होना था।

न्यू - जलपाईगुड़ी के स्टेशन पर पहुंचते ही हम ने पाया कि  चीज़न मैडम दो इनोवा गाड़ियों के साथ हमारा इंतजार कर रहीं थी। हमें देखते हो बड़े गर्मजोशी से उन्होंने हमारा  स्वागत किया।

इसके बाद हम सभी लोग गाड़ियों में  बैठ कर भूटान बॉर्डर जयगांव के लिए रवाना हो गए ।  रास्ते में अलीपुर द्वार के लिए बना गेट देख कर मुझे वहां रहने वाली अपनी बालमित्र विद्या विश्वकर्मा की याद आई जो मूलतः भूटानी। ही हैऔर वर्तमान में वहीं रहती है।  साढ़े तीन घंटे की अपनी लंबी यात्रा के उपरांत हम जलगांव को जो भारत की अंतिम सीमा है पर करते हुए भूटान  में प्रवेश कर phuentsholing  पहुंच गए।

फुएंत्शोलिंग भूटान का सीमावर्ती शहर है जो भूटान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है, फुएंत्शोलिंग भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के साथ अपनी सीमा साझा करता है। कोलकाता और सिलीगुड़ी से आने वाले यात्रियों के लिए प्रवेश बिंदु के रूप में कार्य करते हुए, यह भूटान का एक महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र है। यह भूटान के अधिकांश शहरों की तुलना में अधिक विकसित है, फिर भी इसमें प्रकृति  को अपने में समेटे यह स्थान अतुलनीय सौंदर्य से  भरी हुई है।  विभिन्न समुदाय के लोग यहां एक साथ रहते हुए देखे जा सकते है, यह भूटान में अवश्य जाने वाली जगह है।

फुएंत्शोलिंग  अपनी आधुनिक वास्तुकला के लिए जाना जाता है। यह भूटान का एक मूल्यवान व्यापारिक केंद्र है भी है, जहाँ भारतीय, नेपाली और भूटानी सभी एक साथ रहते हैं और इस शहर में सौहार्दपूर्ण ढंग से व्यापार करते हैं। यहां हमारी बुकिंग  मेटो पेमा हाॅटल में थी जहां रात भर आराम करने के बाद अगली सुबह हमे भूटान में प्रवेश करने हेतु  परमिट लेने हेतु इमिग्रेशन ऑफिस जाना था।

हां, भारतीय पासपोर्ट धारकों को भूटान में प्रवेश पाने के लिए    फुएंत्शोलिंग में इमिग्रेशन ऑफिस से जारी एक प्रवेश परमिट लेना होता है। यह परमिट 7 दिनों की अवधि के लिए वैध है और सड़क मार्ग से भूटान की ट्रेवल करने वालों को सत्यापन के लिए प्रत्येक चेकपॉइंट पर इसे दिखाना होता है।

भारतीय नागरिकों को भूटान में प्रवेश करने के लिए वीज़ा की आवश्यकता नहीं होती है। हालाँकि, भूटान की यात्रा करने वाले भारतीय नागरिकों को देश में प्रवेश करने के लिए प्रवेश परमिट प्राप्त करना आवश्यक है। इमिग्रेशन विभाग यात्री के वैध दस्तावेजों जैसे वयस्कों  के लिए  मतदाता परिचय पत्र और बच्चो के लिए  जन्म प्रमाण पत्र जो मूलतः अंग्रेजी में हो की जाँच करने के बाद प्रवेश परमिट जारी करता है।  जिसे प्राप्त करने उपरांत हम पुनः 12 तारीख को भूटान की राजधानी थिम्फू के लिए अपने सफर के लिए तैयार हो गए।

क्रमशः…...

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