विकास चाही या प्रकाश (छत्तीसगढ़ी लघुकथा) Shrawan sahu 'Prakhar'

  विकास चाही या प्रकाश (लघुकथा)



                       रामआसरा ह आज बीस बच्छर बाद अपन गांव जावत हे,बीस बच्छर पहिली अपन गांव ल छोड़ के पेट बेकारी करे खातिर रामआसरा ह अपन परिवार ल लेके रैपुर शहर म आके रिक्शा चला के अपन दु झन लइका ल पालिस पोसीस हे,अउ अपन इमानदारी अउ मिहनत के भरोसा म दु कुरिया के घर बना डरे हावय।पुरखा के घर आज भी गांव म ले-दे के खड़े हावय,उहि ल देखे के खातिर रामआसरा ह मोटर म बैठ के अपन गांव जावत हे।

                  मोटर म बइठे-बइठे रामआसरा ह बीस बच्छर पहिली के गांव के सुरता ल करत हावय कि, हमर गांव कइसन सुग्घर रिहिस, खेत खार,नदिया नरवा,रुख राई अउ अमराई ,गांव के लोकपरम्परा ,नाचा गम्मत, लीला मंडली,मड़ई मेला,तीज तिहार ह एकक करके वोकर आँखी के आघु म झूलत रहे,अउ रामआसरा ह उहि गांव के निरमल रूप के दरसन करे के आसा म मने-मन मनमाने खुश होवत राहय ।इही सोच बिचार म पचास किलोमीटर के रद्दा ह कतका बेर कट गे कुछु पता नइ चलिस।



               मोटर ले उतरे के बाद गांव के विकास ल देख के रामआसरा ह अकचकागे,सोचे ल धर लिस अरे बाप हमर गांव के तो पुरा के पुरा कायाकल्प हो गे हावय, घास फूस अउ कच्चा खपरैल के घर तो अब खोजे म नइ मिले ,वोकर जगा म बड़े बड़े महल बन गे हावय, माटी के नामोनिशान नइ हे, वोकर जगा म दु तीन मंजिल के टाइल्स के आलीशान मकान बन गे हावय।बड़े बड़े लम्बा चौड़ा सड़क,बस स्टेसन,इस्कूल,अस्पताल,तहसीली सब चीज ह चकाचक हो गे हावय।मनखे के खानपान अउ पहरई ,ओढ़ई बात बेवहार ह कतेक बदल गे,ये सब विकास ल देख के रामआसरा ह सोच म पड़ गे, कि बीस बच्छर म वोकर गांव ह कहाँ से कहाँ पहुँच गे।



           इही बात ल सोचत-सोचत अपन पुरखा के घर म पहुचिस त घर ह बिना मनखे के भुत बंगला बन गे रिहिस, उपर से आजु बाजू के मनखे मन ह वोकर घर म बेजा कब्जा कर ले रिहिस।वोकर के पारा परोस मन ह वोकर से लड़ाई झगरा म उतर गे, बात अतेक बढ़गे, कि नालिस अदालत के नौबत आगे।रामआसरा बड़ दुखी होगे, ये घटना ल देख के रामआसरा के भगवान अउ वो गांव वाला मन के उपर से आसरा टुट गे।



             भारी मन से वापिस लहुटे ल धरिस त का देखथे कि गांव के हरेक गली म मारे चिखला पानी अउ गन्दगी के रेंगना मुस्कुल होवत राहय।गांव के बुनियादी इस्कूल करा आइस त वोकर एक ठन पोस्टर म लिखाय राहय," हम सुधरेंगे- युग सुधरेगा,",उहि पोस्टर के खाल्हे म चार पांच झन मनखे जेन दिखे म पढ़े लिखे जान पड़त रिहिस हे,उहि मन ह गांजा ल चिलम म भर-भर के खुलेआम धुँआ उड़ावत रिहिस,त कोन्हो ह गुटखा खा-खा के इस्कूल के कोठ म पचर-पचर थूकते राहे,अउ दुख के वजन ह तो तब अउ बाढ़गे,जब रामआसरा का देखथे कि गांव के कुछ बुजुरुक सियान मन ह दु चार झन जवनहा,अउ लइकुसहा लइका ल बटोर के रामलीला के मंगल भवन म बइठ के ताश खेलत राहय,इही बीच म कुछ मंदहा मन ह दारु पी के खुलेआम दाई बहिनी के गारी देवत राहय,फेर ये किसिम के मनखे मन ल  हरकइया बरजइया कोनो नइ रिहिस।



                अतेक दृश्य ल देख के आज रामआसरा के बिस्वास ह डिगे ल धर लिस जेन ह अब तक इही मान के चले कि ये धरती म सुख,चैन अउ शांति अगर कान्हचो हावय तो वो हरे हमर गांव ,वोहा यहू बिस्वास करे कि,ईश्वर के दरशन सिरिफ गांव के सिधवा मनखे म मिलथे,, आज वोकर सोच ह भरभरा के टुट गे।

         


  भारी मन से रामआसरा ह फेर उहि मोटर म आके बइठ गे, अउ मने मन सोचत हावय सहिच म आज गांव म भारी विकास होगे,,, विकास अतेक कि मनखे ह मनखे के बैरी हो गे, हमर सुग्घर संस्कृति अउ संस्कार ह न जाने कहाँ नंदागे,,,,विकास अतेक हो गे हावय कि गांव के अच्छाई म शहर के बुराई ह राज करे ल धर लिस,,विकास अतेक होगे हावय कि लोगन मन ह अब पंच परमेश्वर म बिस्वास करे के जगा म नालिश अदालत के चक्कर लगावत हे,,, विकास अतेक होगे हावय कि रामलीला के मंच म महाभारत के मंचन होवत हे,,, विकास अतेक होगे हे कि गांव के तरिया नरवा,रुख राई अउ अमराई ह बेजा कब्जा के भेंट चढ़ गे हावय।विकास,, विकास,, विकास,,,, लेकिन ये विकास के चक्कर म प्रकाश गायब होगे हे,,, गांव के चौपाल म सियान मन के सियानी गोठ टीवी सीरियल म समागे ,लइका मन के पिट्टूल,बिल्लस ,ह अब पब्जी गेम के शिकार होगे।

गांव के नोनी -बाबू मन अब अपन समय आय के पहिली जवान होगे, अउ बेलगाम जबान होगे।हमर रामायण अउ गीता के वाणी,राम रहीम के दोहा,आल्हा पंडवानी के किस्सा, सगा सोदर के पहुनाई के पवरित ग्यान के प्रकाश कहां छप होगे,,, आज मनखे ह कतेक विषय के विद्वान  होगे हावय,फेर  विद्यावान अउ चरित्रवान  एक भी नइ दिखे,, एक लंबा सांस लेवत रामआसरा ह सोचे का विकास के अतेक बड़ कीमत चुकाए ल परगे कि, ज्ञान के प्रकाश ह अज्ञानता के अंधियार म छप होगे,,आखिर घर जाके हरेक मनखे ल रामआसरा ह पूछत हावय कि विकास अउ प्रकाश ह का एक संघरा नइ रहि सकय  ??मनखे के जिनगी के लिए का जियादा जरूरी हे"विकास या प्रकाश"-समय राहत सब झन ल सोचे ल पड़ही कि इंसानियत ल बचाय खातिर"विकास चाही या प्रकाश"????



रचनाकार–श्रवण कुमार साहू,"प्रखर"

शिक्षक/साहित्यकार,राजिम, जिला गरियाबंद,(छ. ग.)

मोर लिखे गीत कविता ल तो हमेशा देखत सुनत रहिथो,,, ये बार मेंहा एक ठन लघुकथा लिखे हो,,,ये ला एक बार धियान लगा के जरूर पढ़हूँ,अउ अपन आशीर्वाद, स्नेह अउ मार्गदर्शन देहू,,सादर,,,, श्रवण कुमार साहू,"प्रखर"

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