पिंजरे का तोता /लघुकथा
बालकनी में रखी कुर्सी पर बैठ वह खुद से बनाई चाय की पहली घूंट लेने ही वाली थी की मोबाइल की घंटी बज उठी। छोटी बहन का नंबर स्क्रीन पर डिस्प्ले हो रहा था।
"हेलो सोनी!".. उसने कॉल रिसीव किया।
"कैसी हो दीदी!" बहन अपने चिर परिचित अंदाज में चहक रही थी।
"ठीक हूँ!.इतनी सुबह कैसे याद किया?"
"दीदी!. रंजन के विवाह का कार्ड पहुंचा आपके पास?"
"हाँ!.मिला तो है।"
"कब निकलना है?..टिकट कब की है?" उत्साहित छोटी बहन जानने के लिए उतावली हुई।
"अभी कुछ पता नहीं है।" दीप्ति सोनी के उत्साह के विपरीत मनोदशा से गुजर रही थी।
वैसे मेरठ से बनारस दूर तो नहीं था, लेकिन बच्चों के फाइनल परीक्षाओं की तारीख विवाह समारोह के बीच पड़ने की वजह से मुंबई में रहने वाली छोटी बहन के मुकाबले उसके पहुंचने की संभावना नहीं के बराबर थी।
"दीदी,.हम सीधा बारात के दिन ही पहुंच पाएंगे,.टिकट नहीं मिली।"सोनी बताने लगी।
दीप्ति के मन में हलचल सी मची। रंजन दोनों बहनों का इकलौता ममेरा भाई है, वह भी सबसे छोटा।
"दीदी कोशिश कर आप भी आ जाओ,.फिर वापसी की टिकट दूसरे दिन की ही ले लेना।" सोनी सुझाव देने लगी।
"नहीं सोनी!. बच्चों के इंतहान है।"
"दीदी एक-दो दिन तो जीजाजी संभाल ही सकते हैं ना!" वह कुछ बोली नहीं,.आखिर सोनी कह तो सही रही थी।
"अच्छा दीदी,.रखती हूँ!.कंफर्म होकर फोन करना।"
फोन डिस्कनेक्ट हो गया।
बिना अलार्म बजे सबसे पहले जागकर,.सीधे किचन में पहुंच बच्चों का मनपसंद लंच बनाने की तैयारी!.बच्चे भी गजब के जिद्दी खाना उसके हाथ से ही खाना है..और स्कूल बस तक उसके साथ ही जाना है।
इन्हीं विचारों में खोई अचानक उसकी नजरें बालकनी में टंगे पिंजरे में बैठे तोते पर टिक गई।
"क्या सोच रही हो?"
पति की आवाज से उसकी तंद्रा भंग हुई।
"मैं सोच रही थी रंजन के विवाह में चली जाऊं।"
"अच्छा!".. उसके पति को आश्चर्य हुआ क्योंकि उसने पहले कभी अकेले सफर नहीं किया था।
"हाँ!.वैसे भी विवाह कौन सा रोज-रोज होता है।" उसने पतिदेव की मनोदशा भांपने की कोशिश की।
"कह तो तुम सही रही हो,..चलो ठीक है!. तत्काल टिकट देखता हूँ।"
कहते हुए उसके पति ने रेलवे ऐप खोल दिया।
इस विषय पर बिना अपने पति से बात किए वह खुद अपने विचारों में खोई अब तक सहज महसूस कर रही थी किंतु पति की सहमति के बाद उसकी घबराहट बढ़ गई,.वह असहज होने लगी।
"सुनिए!".. उसने पति के हाथ से मोबाइल ले लिया।
"अरे!.क्या हुआ?" उसकी यह हरकत पति के कुछ पल्ले नहीं पड़ी।
"रहने दीजिए!..फिर कभी चली जाऊंगी।"
उसकी पल भर में बदली मनोदशा से उसका पति आश्चर्य में था और वो खुद भी,..क्योंकि पिंजरे का दरवाजा बंद नहीं था फिर भी तोता पिंजरे के भीतर बैठा मज़े से मिर्च खा रहा था।।
पुष्पा कुमारी "पुष्प"
पुणे (महाराष्ट्र)
02/04/2020



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