आतिथ्य

ऐतिहासिक एकांकी 


आतिथ्य
पात्र परिचय 
१)महाराणा प्रताप–मेवाड़ के महाराणा 
२) महारानी–महाराणा प्रताप की धर्मपत्नी 
३) बसंत कुमारी–महाराणा प्रताप की पुत्री 
४) कुमार–महाराणा प्रताप का अबोध पुत्र 
५) अतिथि–एक साधु। 
(स्थान– अरावली पर्वत की तराई में एक बीहड़ वन, पास ही एक छोटा झरना दिख रहा है।महाराणा विवर्त मुख एक चट्टान पर चिन्तित मुद्रा में बैठे हुए हैं। पार्श्व में तलवार रखी हुई है।एक दीर्घ नि:स्वास के साथ महाराणा स्वत: कुछ कह रहे हैं) 
महाराणा–(स्वागत) "कर्त्तव्य का कठिन वि ........ मातृभूमि की रक्षा का प्रण...  दुराचारी,विधर्मियों से प्रतिशोध..... प्रताप! तुझे विश्रांति कहां? जन्मभूमि के सेवक,महाराणा उदय सिंह के वंशधर !‌ मेवाड़ की परतंत्रता में तुझे शांति कहां मिलेगी!" 
(मुख सूख जाता है) 
"हां शांति और विश्रांति....ये दोनों तेरे जीवन में नहीं, तेरे जीवन की सहचर क्रांति देवी है।" (कुछ सोचते हुए) "आह जन्मभूमि.... प्राण देकर कर भी तुझे मुक्त कर सका होता।" (दीर्घ नि:स्वास) 
(महारानी का प्रवेश--मलिन वेश-भूषा हाथ में एक दोना है, जिसमें जल भरा हुआ है जो नीचे बूंद-बूंद करके टपक रहा है।आश्वासन भरे स्वर में महाराणा को संबोधित करती है।) 
महाराणा–"आर्य पुत्र! इतनी व्यग्रता उचित नहीं ..... धैर्य धारण करें, तुलजा भवानी सब मंगल करेंगी, लीजिए ये मुंह धो लीजिए।" 
(जल देती है) 
महाराणा– (मुंह धोकर) "धैर्य धारण करूं.... तुम भी क्षत्राणी होकर कहती हो-- धैर्य धारण कर लूं....... शायद, मातृभूमि की अपेक्षा तुम्हें यह शरीर अधिक प्रिय है। किंतु प्रताप.....को धैर्य कहां? जब तक मां परतंत्र है, धैर्य कैसे पा सकेगा वह?" 
(बंसत कुमारी का प्रवेश-- अंक में नन्हें शिशु को लिए हुए वह आती है। पिता को उदास देखकर उन्हें प्रसन्न करने का उपक्रम करती है) 
बसंत कुमारी–"देखो न..... पिता जी! झरने में बहते हुए फूल कैसे अच्छे लगते हैं...... मैं अभी तक कुमार को झरने के पास बैठा कर फूल चुनती रही हूं, फिर इसने सब उठा कर उसी झरने में डाल दिये। उन्हें बहते देख हंस रहा है.......ढीठ छोकरा।" 
(पुनः फूल तोड़ने जाती है) 
महाराणा–"बेटी बंसत! कांटो में मत जाओ। करौंदी के फूल तोड़ कर हाथ विक्षत न कर लेना।" 
बसंत कुमारी–"पिताजी! आप कांटो से डरते हैं? पर मैं तो नहीं डरती, देखिए अभी डेर से फूल तोड़ लाती हूं।" 
महाराणा---"तूं कांटों से नहीं डरती.... मेरी अबोध पुत्री!डरना भी नहीं चाहिए। (भावावेश में)  काटे तो व्यवधान हैं,जो कांटों से डरेगा,वह फूल कैसे चुन सकेगा बसंत! पर बेटी, तुम बहुत दुबली हो..... कहीं मत जाओ।" 
(उसके मुंह की ओर देखकर) 
हाय! मैं पिता हूं ....फूल-सी कोमल राजकुमारी और नन्हा अबोध शिशु.......जीवन संघर्षों का जिन्हें कोई ज्ञान नहीं...... लगातार तीन दिनों के उपवास से क्षीण हो रहे हैं....और मैं...(आंखों में आंसू) 
(इसी समय महारानी जो किसी कार्यवश अन्यत्र चली गई थी-- प्रवेश करती है। "मां ....मां ' कहते हुए उस शिशु को गोद में लेकर वे महाराणा से पुन: कहती हैं।) 
महारानी----आर्य पुत्र ! अधीर न हो, धैर्य रखें, भगवान सभी कुछ देखते हैं।" 
महाराणा–धैर्य कहती हो  प्रिये! कहां तक धारण करूं। सिंह की माॅद पर श्रृगालो ने डाका डाल दिया हो.... वह निर्वासित होकर भटक रहा हो,.... उसके शावक तृषा और  क्षुधा से व्याकुल हो रहे हों और वह धैर्य धारण किए बैठा रहे..... कैसे संभव है? 
महारानी--किंतु कुछ उपाय भी तो नहीं, देखिए यह कुमार भूख से रो रहा है....क्या करूं कुछ भी तो सूझ नहीं पड़ता। 
महाराणा--विडम्बना.... विडम्बना है। मेरे पुरूषत्व की...धिक्कार है मुझे.... वाह रे भाग्य! तुझ में वह शक्ति है जो राव को रंक और रंक को राव बना सकती है। मेवाड़ के महाराणा को दाने-दाने के लिए तरस आ सकती है। 
.... किन्तु मातृभूमि की रक्षा के लिए यह भी स्वीकार है।'प्रताप' निर्जन में प्राण दे सकता है, किंतु आततायियों के समक्ष सिर नहीं झुका सकता। 
(शिशु पुन: रोने लगता है, महारानी उसे चुप कराते हुए कहती है।) 
महारानी--"चुप हो जाओ मेरे लाल, मेरी आशाओं के कर्णाधार....शांत हो जाओ बेटा। 
(अंक मे लेकर थपकी देती  हुई) 
.... उस दिन नीवार के कुछ दाने चुने थे।दो रोटियां बन पाई थी।एक वह बिलाव ले गया था और दूसरी अपने हिस्से की रोटी राजकुमारी ने दे दी थी।तुम्हें...मेरी आंखों के तारे चुप हो जाओ।" 
महाराणा--" महारानी! यदि कुछ मिल सके तो पुनः आज इन्हें रोटियां बना दो...आगे ईश्वर है.. अबोध बच्चे कहां तक सहिन करें।" 
महारानी---"हां देखिए न, कुमारी कितनी दुबली हो गई है। कल उसने जल पीकर दिन बिताया.... देखा नहीं जाता नाथ! (गला भर आता है) 
(महारानी नीवार के दाने चुनने का उपक्रम करती है। शिशु पुनः रोने लगता है) 
      #पर्दा गिरता है।# 
   दृश्य: दूसरा 
( स्थान- वही,प्रताप के पास बैठी हुई महारानी जंगली बीजों की रोटियां पका रही हैं। मध्यान्ह के सूर्य की रश्मियां महारानी के नाक में स्थित एकमात्र स्वर्ण भूषण को सिंदूरी बना रही हैं। महारानी रोटियां सेंक कर हाथ धोने उठती है।) 
महारानी---(हाथ धोने के पश्चात दूर तक कहीं दृष्टि डालती हुई ) छोरी!ओ छोरी! देख रोटियां बन गईं,लल्ला को ले आ ना। 
बसंतकुमारी--(दूर से शिशु को साथ लिए हुए)आई मां! अभी आई,लल्ला को करोंदी खिला रही थी...पकी..पकी.. लाल... लाल.. करौंदी... बड़ी मीठी होती हैं... तुम्हें भी ले आऊं मां। 
महारानी--- नहीं बेटी अब वहां न जाओं भवानी ने आज प्रसाद का सुयोग उपस्थित कर दिया है। लो करोंदी नहीं, उनका प्रसाद खाओ। 
(रोटियां निकाल कर एक कुमार को और दूसरी बसंत को देती है,बसंत अनमनी होकर सिर हिलाती है।) 
   बसंत कुमारी--- "तुम तो मेरी करौंदी भी नहीं खाओगी और मुझे रोटी देती हो... पहले तू मेरी करोंदी खा,तब लूंगी मैं तेरी रोटी। 
... खूब पकी-पकी करौंदी खायेगी मां? 
(मां की गर्दन में बांहों का झूला डाल देती है।) 
कुमार शंकित-सा खड़ा रोटी खा रहा है। कदाचित उसे उस दिन की स्मृति आ रही है। जिस दिन उस क्रूर माजीर ने उसके हाथ की रोटी को झपट कर छीन लिया था। 
(महारानी बेटी का मुंह चूम कर उसकी उंगलियां सहलाने लगती है-प्यार भरे स्वर में पुचकारती है।) 
महारानी-- क्यों नहीं खाऊंगी भला अपनी बसंत के हाथों की करोंदियां नहीं खाऊंगी... मेरी प्यारी गुड़िया!ले खा ले रोटी प्यारी बेटी...( कंठ भर आता है) 
(राजकुमारी रोटी ले लेती है। महारानी किसी कार्यवश अन्यत्र चली जाती है। बसंतकुमारी स्वत: कुछ कह रही है।) 
बसंत कुमारी--(स्वगत) "मैं खा लूं यह रोटी? थोड़ी देर में कुमार फिर रोएगा..तब इतनी जल्दी मां कहां से रोटी दे सकेगी.. नहीं,.. नहीं, मैं नहीं खाऊंगी। कुमार का रोना सहिन नहीं होता। 
(पलकों की कोरों में झलक आये अश्रु बिंदुओं को पोंछते हुए रोटी को एक पत्थर के नीचे दबा देती है। एक ओर से एक साधु अतिथि के साथ महाराणा प्रवेश करते हैं। एक प्रस्तर खंड में अपना उत्तरीय बिछाकर उसमें अतिथि को बिठलाते हैं।) 
महाराणा--- "महाराज! वनवासी अकिंचन का आतिथ्य स्वीकार करें।( पाद प्रक्षालन के लिए दोनें में जल देते हुए) 
मुझ निर्वासित निवासस्थली को कृतार्थ किया देव-दर्शन ने।" 
(हाथ जोड़ लेते हैं।) 
अतिथ--- धन्य हो सम्राट! आर्यावर्त के उद्धारक मेवाड़ के सूर्य, तुम बार-बार धन्य हो।मैं सत्कृत हुआ...अब आगे मुझे दक्षिण जाना है।"(पाद प्रक्षालन के अनन्तर जाने का उपक्रम करते हैं।) 
महाराणा--"(रोकते हुए) ठहरिए.. तनिक देर और ठहरिए मुझे आतिथ्य से वंचित ना कीजिए।" 
(साधु बैठ जाते हैं, महाराणा रानी को पुकारते हैं-- बालिका बसंतकुमारी' पिता का अभिप्राय समझकर वह रोटी उपस्थित कर देती है। अतिथि भोजन पाकर प्रस्थान कर देते हैं।राजकुमार की पलकें ढपने लगती हैं, अचानक वह धमाक से नीचे गिर जाती है। महाराणा शीघ्रता से दौड़ते हैं---दूसरी तरफ से महारानी भी आ जाती है।भूख से आशक्त पुत्री के मुंह में दोनों जल के छींटे डालते और व्यजक करते हैं।) 
महारानी--- हाय!विधाता,यह क्या हो गया, मेरी बेटी को क्या हुआ-- बेटी --बेटी --वेऽऽऽटी। 
(शिला में गिर पड़ती है।) 
महाराणा--(अवरूद्ध कंठ)मेरी बसंत!आंख खोल न।रानी यह क्या हुआ तुझे, मेरी बेटी...मेरी आंखों की पुतली।(रो पड़ते हैं।) 
(कुमारी धीरे-धीरे आंखें खोलती है, पिता-माता को पास देख फटे स्वर में बोलती है।) 
बसंत कुमारी--- "पिता जी! आप रो क्यों रहे हैं? क्या महात्मा.. जी ने रोटी नहीं खाई? क्या आपका धर्म...पू ऽऽ रा ...नहीं हुआ...बोलो...बोलो न पिता जी!" 
(सहमी आंखों से मां की ओर देखते हुए) 
मां.. क्या.. करोंदी के..फल ले आऊं... जिससे उनकी भूख मिट जाये।(कराहती हुई आवाज में) उठो न.. मां,मेरी अच्छी मां.....बो...लो...न ? 
(जीभ लड़खड़ा जाती है-- पुतलियां स्थिर हो जाती हैं-- कुमारी का जीवन-दीप स्वर्ग का आतिथ्य ग्रहण करने चला जाता है।) 
( परदा गिरता है।)
!!समाप्त!!
प्रकाश पाण्डेय "बंजारी"
(प्राथमिक शिक्षक)
शासकीय प्राथमिक विद्यालय पथरियान, जनशिक्षा केन्द्र-सब्दुआ, अजयगढ़,जिला पन्ना
मोबाइल - 9752309088
मौलिक,अप्रकाशित एवं स्वरचित।

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