लघुकथा-शिक्षा का महत्व



  बुधनी बाई सीधी सादी महिला थी। बोलती कम थी व सलीके से रहती थी। दो-तीन घर नौकरानी का काम करती थी मेरे यहां भी वह काम करती थी, कुछ दिनों से मुझे लग रहा था कि वह कुछ बोलना चाह रही है लेकिन बोल नहीं पा रही है।मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने पूछ लिया बुधनी तुम कुछ कहना चाह रही हो लेकिन बोलती क्यों नहीं उसने कहा मेरी बेटी नवमीं में पढ़ती है वह मुझे काम पर आने से मना करती है कहती है क्यों माँ दूसरों के यहाँ काम करती हो घर पर रहो समझती नहीं नादान है,मैंने कहा कल उसको अपने साथ लेकर आना।
     दूसरे दिन बुधनी बाई कमला को लेकर घर आई देखने से लगता था कि कमला पढा़ई में तेज है अपनी माँ का नाम रोशन करेगी, मैंने कहा बेटा तुम पढ़लिख कर क्या बनना चाहती हो उसने झट से कहा नर्स बनना चाहती हूं।
मेरे पिताजी की मृत्यु बीमारी से हुई थी इसलिए मैं परिवार व दुसरों की सेवा करना चाहती हूं। मैंने कहा प्रतिदिन स्कूल जाना,पढा़ई मन लगा कर करना अपनी माँ को परेशान मत करना घर में पैसों की जरुरत पड़ती है, पैसों के लिए काम करना पड़ता है तुम्हारी माँ पढ़ीलिखी नहीं है इसलिए नौकरी नहीं मिल सकती उसने सिर झुका कर कहा ठीक है।
      कुछ साल बीत गए मैं अभी उस बात को भूली नही थी।
एकदिन बुधनी बाई अच्छे से तैयार होकर आई,खुशी के मारे फूली नही समा रही थी लग रहा था दुनिया की सारी दौलत मिल गई है, उसे मैं कुछ बोल पाती उसके पहले ही उसने  मिठाई का डिब्बा थमा दिया और बिना रुके जल्दी-जल्दी  बोलने लगी कमला को नौकरी मिल गई है बहन जी अब मेरे को सब कहेंगे वो देखो कमला सिस्टर की माँ जा रही है।उसकी आँखों में खुशी के आँसू झिलमिला  रहे थे,मेरी आँखें भी खुशी से छलक पड़ी।

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श्रीमती सविता बरई शिक्षक
विकासखंड-सीतापुर जिला-सरगुजा राज्य-छत्तीसगढ़

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