सत्य का सूर्योदय

 सत्य का सूर्योदय

एक गाँव में दो वृक्ष थे। एक विशाल बरगद, जिसकी छाया दूर-दूर तक फैली थी, और दूसरा एक छोटा-सा पीपल का पौधा, अभी धीरे-धीरे बढ़ रहा था।

बरगद को अपने विशाल होने का बड़ा अभिमान था। उसे लगता था पूरे गाँव पर बस उसी का राज है। लोग उसकी छाया में बैठते, तो वह खुद को सबसे बड़ा मान बैठा था। पर जब उसने देखा कि लोग उस नन्हे पीपल की हरियाली की, उसकी बढ़ती जीवन-शक्ति की भी बात करने लगे हैं, तो कहीं भीतर ईर्ष्या सुलगने लगी।

उसने हवा से कहा, "जा, लोगों से कह दे — यह पौधा कमज़ोर है, कभी बड़ा नहीं हो पाएगा।"

धूल से कहा, "इसके पत्तों पर जम जा, ताकि इसकी हरियाली किसी को दिखे ही नहीं।"

कुछ पक्षियों से भी कहा, "जहाँ बैठो, इसी की टहनियाँ तोड़ना।"

धीरे-धीरे बातें गाँव में फैलने लगीं। कुछ लोगों ने बिना जाँचे-परखे मान भी लिया। कहने लगे, "सच ही होगा शायद — इतने लोग तो कह रहे हैं।"

छोटा पीपल यह सब सुनता रहा। मन कई बार टूटा। सोचा, "क्या सच में मैं इतना कमज़ोर हूँ? क्या झूठ ही अब मेरी पहचान बनकर रह जाएगा?"

तभी पास बहती नदी मुस्कुराई, बोली, "बेटा, पानी शोर नहीं करता, फिर भी प्यास वही बुझाता है। सच भी कुछ ऐसा ही होता है। उसे खुद को साबित करने की कोई जल्दी नहीं होती।"

पीपल ने किसी से बहस नहीं की। बस अपनी जड़ें और गहरी करता गया। धूप सही, आँधियाँ झेलीं, बारिश को अपनाया, और चुपचाप बढ़ता रहा। समय बीतता गया।

एक दिन भयंकर आँधी आई। बरगद की कई सूखी डालियाँ टूटकर गिर पड़ीं। दिखने में तो वह बहुत भव्य था, पर भीतर से जगह-जगह खोखला हो चुका था।

वहीं छोटा पीपल — जिसकी जड़ें सच की तरह धरती में गहरे उतर चुकी थीं — डगमगाया ज़रूर, पर गिरा नहीं।

आँधी थमने पर जब गाँव वाले बाहर निकले, तो पहली बार उन्हें दोनों की असली सूरत दिखी।

समझ आया कि किसी के बारे में बार-बार कही बात सच नहीं बन जाती। झूठ चाहे जितना ताक़तवर दिखे, बस भ्रम पैदा कर सकता है — चरित्र नहीं गढ़ सकता।

उस शाम गाँव के सबसे बुज़ुर्ग ने बच्चों से कहा —

"याद रखना — झूठ की सबसे बड़ी ताक़त उसका शोर है, और सच की सबसे बड़ी ताक़त उसका धैर्य। झूठ कुछ समय के लिए आँखों पर पर्दा डाल सकता है, पर वक़्त की धूप वो पर्दा एक दिन ज़रूर हटा देती है।"

शाम ढल रही थी। बरगद पहली बार चुप था, और पीपल के पत्ते हवा के साथ हौले-हौले मुस्कुरा रहे थे —

क्योंकि उन्हें पता था, सच को जीतने के लिए किसी षड्यंत्र की नहीं, बस वक़्त की ज़रूरत होती है।

और शायद जीवन का सबसे बड़ा सच यही है —

झूठ कभी-कभी बहुत बलवान दिखता है। उसके पास धन हो सकता है, पद हो सकता है, भीड़ और चालाकी भी। कुछ समय के लिए वह निर्दोष को कठघरे में भी खड़ा कर सकता है। पर उसकी जीत टिकती नहीं। सच अकेला चले, चाल भले धीमी हो — मंज़िल फिर भी तय है। आख़िर में जीत उसी की होती है, जो सच पर, धैर्य पर, अपने कर्म पर डटा रहता है।

श्रीमती ज्योति सराफ (व्याख्याता)

शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कुरदा, चाम्पा

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