एक माँ का मन,बच्चों के परीक्षा के दौरान

एक माँ का मन,बच्चों के परीक्षा के दौरान 

ज से माशिमं की बोर्ड परीक्षा शुरू हो गई।

सुबह जब मैं अपनी बेटी को उसके सेंटर — लाला लाजपतराय स्कूल — लेकर पहुँची, तो रास्ता भले छोटा था, पर मेरे मन के भीतर जाने कितनी लंबी यात्राएँ चल रही थीं।

हम दोनों साथ थे, पर वो आज कुछ अलग थी… बिल्कुल शांत।

रास्ते भर मैं स्कूल की बातें, पढ़ाई की बातें करती रही, लेकिन वह बस सुनती रही।

उसकी चुप्पी में घबराहट नहीं थी — एक गंभीरता थी।

मुझे समझते देर नहीं लगी…

वो मेरी जैसी ही है।

जाते समय उसके हाथों में किताब तो नही, पर आँखों में संकल्प।

बस जो पढ़ा था उसे आँखों के सामने दोहरा रही थी — जैसे मन ही मन खुद को आश्वस्त कर रही हो।

सेंटर पर पहुँचे तो मैंने देखा —

कुछ लड़कियाँ झुंड बनाकर आपस में पूछ रही थीं,

“तूने क्या पढ़ा?”

“ये वाला चैप्टर देखा?”

कुछ लड़के भी उसी तरह चर्चा में लगे थे।पर वो इस बात से डरे की पूछने पर पता चला की इसने ज्यादा पढ़ लिया हो तो मुश्किल हो जाए। 

किसी के चेहरे पर घबराहट थी,

किसी पर आत्मविश्वास की छलक तो कही दिखावा।

लेकिन मेरी बेटी…

वो न किसी चर्चा में पड़ी, न किसी तुलना में।

सीधे अपने कक्ष क्रमांक की सूची के पास गई,

नाम मिलाया,

और शांत भाव से अपने कमरे में प्रवेश कर गई।

उसके उस एक कदम में मुझे मेरा 12th याद आ गया —

मेरा सेंटर पचगवां, अकलतरा,जांजगीर चांपा में था।

पापा मुझे रोज़ छोड़ने जाते थे।

रास्ते भर…

वो लगभग चुप ही रहते थे।

न कोई बड़ी सीख,

न कोई लंबी बातचीत।

बस उनकी उपस्थिति ही साथ चलती थी।

एक सुरक्षा, एक विश्वास की तरह।

मैं भी शायद उस समय भीतर ही भीतर पेपर दोहराती रहती थी —

पर बाहर से शांत।

लेकिन जैसे ही पेपर खत्म होता…

बस फिर तो मैं बदल जाती!

दोस्तों के बीच पहुँचते ही मैं झूम-झूम कर बताती —

“अरे ये वाला सवाल आया था!”

“मैंने तो ऐसे लिखा!”

“तूने क्या किया?”

और उधर पापा…

थोड़ी दूरी पर खड़े इंतज़ार करते रहते।

फिर मुस्कुराकर बार-बार कहते —

“हो गया तेरा? चलें… चलें?”

मेरी बेटी......

आज वो बड़ी हो गई है।

अब वो समझती है कि परीक्षा हॉल में प्रवेश से पहले शांति सबसे बड़ा सहारा होती है।

मैंने बस उसे अंदर जाते देखा…

और फिर गाड़ी मोड़ ली।

वापस आते हुए मन में एक अजीब-सी संतुष्टि थी।

जैसे मैंने उसे केवल स्कूल तक नहीं छोड़ा,

बल्कि जीवन की एक नई सीढ़ी पर खड़ा होते देखा।

अब बस इंतज़ार है…

जब वो लौटकर आएगी,

और वैसे ही बताना शुरू करेगी —

“मम्मी, पेपर बहुत अच्छा गया…”

मुझे विश्वास है —

उसका पेपर अच्छा ही जाएगा।

क्योंकि उसने केवल पढ़ाई नहीं की,

उसने जिम्मेदारी सीखी है।

और एक माँ के लिए इससे बड़ी तसल्ली क्या हो सकती है…

कि उसकी बेटी परीक्षा से पहले नहीं,

जीवन से पहले परिपक्व हो गई है।

Dr. Vandana Pandey

#vandanavaani #जीवनमंत्र #ParikshaPeCharcha

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