शादी-ब्याह में प्रदर्शन और अन्न का अपमान

 शादी-ब्याह में प्रदर्शन और अन्न का अपमान

शादी-ब्याह जैसे पवित्र और संस्कारपूर्ण आयोजनों में आज आर्थिक प्रदर्शन की अंधी होड़ लग गई है। “मेरी कमीज तेरी कमीज से ज़्यादा सफ़ेद कैसे” वाली मानसिकता ने इन आयोजनों को दिखावे का अखाड़ा बना दिया है। लोग अपनी वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक खर्च करने को ही सामाजिक प्रतिष्ठा का मानदंड मानने लगे हैं।

प्रणय स्थल हो या गार्डन, धर्मशाला हो या लॉज-होटल—हर जगह टेंट, विद्युत सज्जा और चकाचौंध पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। सजावट तक तो बात समझ आती है, परंतु जब यह प्रदर्शन भोजन तक पहुँच जाता है, तब सबसे अधिक पीड़ा होती है।

आज भोजन, जो कभी सादगी और संतोष का प्रतीक था, वह भी प्रतिस्पर्धा का साधन बन गया है। “कुछ नया हो, कुछ अलग हो” की होड़ में व्यंजनों की संख्या छप्पन भोग को भी पार कर जाती है। परिणामस्वरूप लोग नाममात्र चखते हैं, प्लेटें भरते हैं और फिर अधिकांश भोजन जूठा छोड़ देते हैं। यह छोड़ा गया अन्न न केवल व्यर्थ जाता है, बल्कि इस तरह फेंका जाता है कि वह किसी जरूरतमंद के भी काम नहीं आ पाता।

यह अन्न का अपमान है—उस अन्न का, जिसे उगाने में किसान का पसीना बहता है और जिसे पाने के लिए आज भी असंख्य लोग संघर्ष करते हैं। विडंबना यह है कि एक ओर भव्य समारोहों में भोजन कचरे में जाता है, वहीं दूसरी ओर समाज का बड़ा वर्ग भूख से जूझ रहा है।

समय की मांग है कि हम दिखावे की इस होड़ पर विराम लगाएँ। विवाह और समारोह को आत्मीयता, सादगी और संस्कारों से जोड़ें, न कि अनावश्यक प्रदर्शन से। भोजन को सम्मान दें, उतना ही परोसें जितना आवश्यक हो और अन्न को व्यर्थ होने से बचाएँ—यही सच्ची सामाजिक समझदारी और मानवीय मूल्य हैं।


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