श्रीकृष्ण और भारतीय पर्यावरण-दर्शन : एक सांस्कृतिक विमर्श
भारतीय दर्शन में पर्यावरण कोई बाहरी विषय नहीं, बल्कि जीवन की आत्मा है। प्रकृति और पुरुष, जीव और जगत—सब एक ही तत्त्व के विस्तार हैं। इसी दृष्टि से जब हम द्वापर युग के महानायक भगवान श्रीकृष्ण के जीवन को देखते हैं, तो वह केवल लीला-पुरुषोत्तम नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना के सशक्त प्रतीक भी प्रतीत होते हैं।
श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन संतुलन की साधना है—प्रकृति और मानव के बीच, शक्ति और करुणा के बीच, उपभोग और संरक्षण के बीच। बाल्यावस्था में ही यमुना को विषैला बनाने वाले कालियानाग का दमन केवल एक दैत्य-वध नहीं, बल्कि जल-शुद्धि का दार्शनिक प्रतीक है। जल भारतीय दर्शन में जीवन का आधार है; उसका दूषित होना समस्त सृष्टि के संतुलन को बिगाड़ देता है। कृष्ण का कालियावध यह संदेश देता है कि प्रकृति को विषैला करने वाली शक्तियाँ चाहे कितनी भी प्रबल क्यों न हों, उनका प्रतिरोध धर्म है।
प्रलंबासुर और व्योमासुर जैसे असुर प्रतीक हैं—अग्नि, वायु और आकाश को दूषित करने वाली प्रवृत्तियों के। अग्नि केवल दहन का साधन नहीं, बल्कि यज्ञ और शुद्धि का माध्यम है; वायु प्राण है और आकाश चेतना। इन तत्त्वों का दूषित होना केवल भौतिक संकट नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पतन भी है।
श्रीकृष्ण का इन असुरों का वध करना यह दर्शाता है कि पंचमहाभूतों की शुद्धता बनाए रखना ही सच्चा धर्म है।
गोपालकृष्ण का स्वरूप विशेष रूप से पृथ्वी-दर्शन से जुड़ा है। गौ, वन, पर्वत और नदी—ये सभी पृथ्वी के संवाहक तत्त्व हैं। गोवर्धन लीला में कृष्ण ने इंद्र-केंद्रित अहंकारी व्यवस्था के स्थान पर स्थानीय, प्रकृति-संरक्षक संस्कृति को स्थापित किया। यह विकेन्द्रित, प्रकृति-सम्मत जीवन-दर्शन आज के पर्यावरण विमर्श के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
यह दृष्टि केवल द्वापर तक सीमित नहीं। त्रेता युग में भी रावण द्वारा ‘खर’ और ‘दूषण’ जैसे पात्रों की नियुक्ति इस बात का संकेत है कि पर्यावरण-विनाशक शक्तियाँ हर युग में रही हैं। राम का संघर्ष भी वस्तुतः मर्यादा और संतुलन की रक्षा का संघर्ष है।
इस प्रकार भारतीय दर्शन में अवतार केवल अधर्म के विनाशक नहीं, बल्कि प्रकृति-संरक्षक भी हैं। श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि पर्यावरण की रक्षा कोई आधुनिक विचार नहीं, बल्कि सनातन चेतना है। जब तक मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग मानता रहेगा, संघर्ष रहेगा; और जब स्वयं को उसका अंग मानेगा, तभी शुद्धि, शांति और समृद्धि संभव होगी।


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