श्यामवर्ण : सौंदर्य नहीं, ईश्वरीय शाश्वतता का प्रतीक

श्यामवर्ण : सौंदर्य नहीं, ईश्वरीय शाश्वतता का प्रतीक

भारतीय सभ्यता में सौंदर्य की परिभाषा कभी केवल त्वचा के रंग तक सीमित नहीं रही। यहाँ सौंदर्य का मूल आधार गुण, आचरण, करुणा, तेज और धर्म रहा है। इसके बावजूद आज के समाज में, विशेषकर विवाह जैसे पवित्र संस्कार को लेकर, काले या श्यामवर्ण को दुर्भाग्य, विलंब या बाधा से जोड़ देना एक गहरी सामाजिक भ्रांति बन चुकी है।

जबकि हमारे भारत के ईश्वरीय और आदर्श पुरुषों का वर्ण श्याम रहा है।

श्यामवर्ण : ईश्वर का प्रिय रंग

भगवान श्रीकृष्ण को श्यामसुंदर कहा गया — श्याम अर्थात गहन, अनंत और रहस्यमय।

भगवान शिव—भस्म से आच्छादित, नीलकंठ, औघड़—उनका वर्ण भी श्यामल है।

“सत्यम् शिवम् सुंदरम्” में सुंदरता श्वेतता नहीं, तत्त्व की गहराई है।

भगवान राम, जिन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया, उनका वर्ण भी रामायण में श्याम बताया गया है।

रामायण में श्रीराम के वर्ण का उल्लेख

वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड (1.1.17) में श्रीराम का वर्णन मिलता है—

“श्यामो युवा रक्ताक्षो दीर्घबाहुररोविंदलोचनः।”

अर्थात—

श्रीराम श्यामवर्ण के हैं, युवा हैं, लाल नेत्रों वाले हैं, लंबी भुजाओं वाले हैं और कमल-नयन हैं।

यह स्पष्ट करता है कि श्रीराम का सौंदर्य उनके रंग से नहीं, बल्कि उनके तेज, करुणा, धर्म और मर्यादा से प्रकाशित होता है। श्यामवर्ण यहाँ दैवीय गरिमा का प्रतीक है।

गोरा बनाम श्याम : दृष्टि का भ्रम

यह सच है कि गोरा रंग देखने में कुछ लोगों को आकर्षक लग सकता है, पर आकर्षण क्षणिक होता है।

श्यामवर्ण शाश्वत है।

वह पृथ्वी का रंग है, मेघ का रंग है, रात्रि की शांति का रंग है, और ब्रह्मांड की गहराई का रंग है।

विवाह में विलंब या कठिनाइयों का कारण रंग नहीं, बल्कि समाज की संकीर्ण सोच, कुंडली-भय और आत्महीन मानसिकता है।

श्यामवर्ण : अभाव नहीं, आशीर्वाद

भारतीय दर्शन में श्यामवर्ण को—

स्थिरता

सहनशीलता

गहराई

रहस्य

और दिव्यता

से जोड़ा गया है।

जिस रंग में कृष्ण की बांसुरी, राम की मर्यादा और शिव का वैराग्य समाया हो, वह रंग कभी अभिशाप नहीं हो सकता।

निष्कर्ष

अब समय आ गया है कि हम रंग के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन करना छोड़ें।

श्यामवर्ण कोई कमी नहीं, ईश्वर की छाया है।

जो समाज श्यामसुंदर को पूजता है, वह श्यामवर्ण मानव को तिरस्कार दे—यह सबसे बड़ा विरोधाभास है।

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