“डिग्री और चूल्हे के बीच खड़ी एक शिक्षिका”
मेरी शिक्षिका बहनों को समर्पित
लोग कहते हैं—
अध्यापिका की नौकरी आसान होती है, छुट्टियाँ ज़्यादा होती हैं।
पर वे यह नहीं देखते कि उसकी सुबह सबसे पहले और रात सबसे बाद में खत्म होती है।
वह घर से निकलते समय शिक्षिका होती है,
पर मन किचन में छूट जाता है—
गैस बंद की या नहीं, बच्चों का टिफ़िन खाया या नहीं।
स्कूल पहुँचते ही उसे अपनी थकान, अपने डर,
सब कुछ मुस्कान के पीछे छुपाना पड़ता है।
खाली पीरियड उसके लिए आराम नहीं,
बल्कि कॉपियों और जिम्मेदारियों का हिसाब होता है।
समाज कह देता है—
“इतनी परेशानी है तो नौकरी छोड़ दो।”
पर कोई यह नहीं पूछता
कि उसकी पढ़ाई, उसकी मेहनत, उसके सपने—
क्या सब सिर्फ़ शादी के बाद चूल्हे तक सिमटने के लिए थे?
आज उसकी नौकरी शौक नहीं,
उस घर की मजबूती है—
ईएमआई, फीस और भविष्य का भरोसा।
शाम को वह टीचर से मशीन बन जाती है,
बिना थके, बिना शिकायत किए।
सबके लिए दौड़ते-दौड़ते
वह खुद को कहीं पीछे छोड़ आती है।
फिर भी, अगली सुबह अलार्म बजते ही
वह फिर उठेगी…
क्योंकि वह सिर्फ़ शिक्षिका नहीं,
एक अदृश्य योद्धा है।
हर उस महिला शिक्षिका को सलाम,
जो रोज़ चुपचाप अपना पूरा संसार संभालती है।
–Dr. Vandana Pandey


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