आतुरता और पूर्णता का भ्रम : युवा ऊर्जा के लिए एक चेतावनी
कुम्हार के चाक पर चढ़ा कच्चा घड़ा धैर्य की माँग करता है। यदि उसे पूरी तरह आकार लेने से पहले ही उतार लिया जाए, तो वह टेढ़ा-मेढ़ा हो जाता है, न उपयोग का रहता है और न ही सौंदर्य का। यही सिद्धांत जीवन और कर्म पर भी समान रूप से लागू होता है। किसी भी कार्य की प्रक्रिया को पूरा किए बिना ही यह मान लेना कि काम हो गया—एक ऐसा भ्रम है, जो भविष्य के परिणामों को विकृत कर देता है।
आज का युवा वर्ग ऊर्जा, उत्साह और आत्मविश्वास से भरपूर है। यह उसकी सबसे बड़ी ताकत है। किंतु यही ऊर्जा जब आतुरता में बदल जाती है, तो वह अधैर्य का रूप ले लेती है। युवा अक्सर किसी कार्य को शीघ्र संपादित करने की चाह में उसकी गहराई, निरंतरता और परिपक्वता को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। प्रारंभिक सफलता, थोड़ी-सी प्रशंसा या आरंभिक परिणाम देखकर वे यह मान बैठते हैं कि लक्ष्य प्राप्त हो गया। यहीं से असली समस्या शुरू होती है।
किसी भी कार्य का वास्तविक मूल्य उसके अंतिम परिणाम और दीर्घकालिक प्रभाव से आँका जाता है, न कि उसकी शुरुआती चमक से। जब कार्य की संपूर्णता से पहले ही उसे पूर्ण मान लिया जाता है, तो सुधार, परिष्कार और आत्ममंथन की प्रक्रिया रुक जाती है। परिणामस्वरूप जो सफलता मिलती है, वह अधूरी, अस्थिर और अल्पकालिक होती है। ठीक वैसे ही जैसे आधा पका घड़ा—जो पहली ठोकर में ही टूट जाता है।
युवा ऊर्जा को दिशा की आवश्यकता होती है, गति की नहीं। धैर्य, अनुशासन और निरंतर प्रयास ही उस ऊर्जा को सार्थक बनाते हैं। कार्य के हर चरण को पूरी निष्ठा से पूरा करना, बीच-बीच में आत्ममूल्यांकन करना और अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के बाद ही संतोष करना—यही सफलता का वास्तविक सूत्र है।
जीवन में स्थायी उपलब्धियाँ वही होती हैं जो समय लेकर, प्रक्रिया का सम्मान करके और पूर्ण समर्पण से अर्जित की जाती हैं। इसलिए आवश्यक है कि युवा केवल जल्दी परिणाम पाने की आकांक्षा न रखें, बल्कि परिणाम को टिकाऊ और सार्थक बनाने पर ध्यान दें। जब चाक पर घूमता घड़ा पूरी तरह आकार ले लेता है और भट्ठी की अग्नि से गुजरकर पकता है, तभी वह उपयोगी बनता है। उसी प्रकार, परिपक्व प्रयास और पूर्णता का धैर्य ही युवा ऊर्जा को वास्तविक सफलता में परिवर्तित कर सकता है।
डॉ. वंदना पांडेय (Adeo)


0 Comments