आत्म-प्रतिस्पर्धा : स्वयं से बेहतर बनने की यात्रा
मनुष्य स्वभाव से जिज्ञासु और गतिशील प्राणी है। समाज में रहते हुए वह न केवल जीवन यापन करता है, बल्कि अपनी पहचान, अपने मूल्य और अपने अस्तित्व को भी गढ़ता है। इसी प्रक्रिया में वह निरंतर कुछ पाने, कुछ बनने और कुछ बेहतर करने की आकांक्षा से बंधा रहता है। यही आकांक्षा जब प्रयास का रूप लेती है, तो उसे हम प्रतिस्पर्धा कहते हैं।सामान्यतः प्रतिस्पर्धा को हम दूसरों से आगे निकलने की होड़ के रूप में देखते हैं। सीमित संसाधन, अवसर और मान्यता—ये सभी प्रतिस्पर्धा को जन्म देते हैं। परंतु जब यह प्रतिस्पर्धा ईर्ष्या, द्वेष या विरोध की भावना से प्रेरित होती है, तब वह व्यक्ति को भीतर से खोखला करने लगती है। ऐसी प्रतिस्पर्धा न विकास देती है, न शांति।
इसके विपरीत एक और प्रकार की प्रतिस्पर्धा है—स्वस्थ प्रतिस्पर्धा। यह वह प्रतिस्पर्धा है, जो व्यक्ति को स्वयं के कल से आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इसमें तुलना दूसरों से नहीं, स्वयं से होती है।
आज मैं कल से बेहतर क्या कर सकता हूँ—यही प्रश्न आत्म-प्रतिस्पर्धा की जड़ में होता है।
प्रतिस्पर्धा सदैव किसी तंत्र से जुड़ी होती है। जब तक हम किसी व्यवस्था, भूमिका या परिस्थिति को साझा करते हैं, तब तक प्रतिस्पर्धा बनी रहती है। जैसे ही वह तंत्र बदलता है, प्रतिस्पर्धा स्वतः समाप्त हो जाती है। लेकिन आत्म-प्रतिस्पर्धा किसी तंत्र की मोहताज नहीं होती। यह व्यक्ति के अंतर्मन में चलती रहने वाली साधना है।
विवेकशील व्यक्ति जानता है कि दूसरों को हराकर मिली विजय क्षणिक होती है, जबकि स्वयं को जीतने से प्राप्त संतोष स्थायी होता है। आत्म-प्रतिस्पर्धा व्यक्ति के विचारों को परिष्कृत करती है, उसके कर्मों को दिशा देती है और उसके व्यक्तित्व को निरंतर निखारती रहती है।
वास्तव में जीवन की सबसे सुंदर दौड़ वही है, जिसमें हम हर दिन स्वयं से एक कदम आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।


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