समझ की उम्र
दसवीं बोर्ड परीक्षा खत्म होते ही मेरे बेटे ने मुझसे कहा, “मम्मी, चलो मूवी देखने चलते हैं।”
मैंने सहज ही पूछा, “अभी तो कोई खास फिल्म लगी नहीं है, कौन-सी देखेंगे?”
उसने तुरंत कहा, “चलो केरल स्टोरी 2 देखते हैं।”
उसकी बात सुनकर मैं थोड़ा चौंक गई। मन में कई सवाल उठने लगे। केरल स्टोरी जैसी फिल्म संवेदनाओं से भरी होगी। मैंने सोचा, क्या वह इतनी कम उम्र में इन जटिल मानवीय भावनाओं को समझ पाएगा? कहीं कोई दृश्य उसे डरा न दे, या उसके मन पर भारी न पड़ जाए।
फिर भी, मन के किसी कोने में फिल्म देखने की इच्छा तो थी ही।जब मेरे बच्चों का exam चल रहा था, मैंने अपनी दोस्त कंचन से पहले ही साथ चलने को कहा था, लेकिन उसके बच्चों की परीक्षाएँ चल रही थीं, इसलिए वह नहीं आ सकी। आखिरकार मैंने बेटे से कहा, “ठीक है, चलेंगे।”
हम दोनों फिल्म देखने पहुँचे।
फिल्म में महिलाओं के प्रति अन्याय, उनके अस्तित्व को नकारने वाली परिस्थितियाँ और उत्पीड़न से भरे कई मार्मिक दृश्य थे। कुछ बातें ऐसी भी थीं जिन्हें सोशल मीडिया पर शब्दों में बताना आसान नहीं।
फिल्म देखते हुए मैंने महसूस किया कि मेरा बेटा कई दृश्यों पर बहुत भावुक हो गया था। दो जगह तो मैंने उसकी आँखों में आँसू भी देखे। फर्क बस इतना था कि इस बार वह जोर से प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था, चुपचाप सब महसूस कर रहा था। उसी क्षण मुझे लगा—मेरा बच्चा अब धीरे-धीरे बड़ा हो रहा है।
फिल्म खत्म होने के बाद उसने मुझसे कहा,
“मम्मी, लड़कियों को अपना हित और अहित समझने की बहुत जरूरत है।”
उसकी यह बात सुनकर मेरे मन की सारी शंकाएँ दूर हो गईं। मुझे खुशी हुई कि उसने वही बात समझी जो समझना सबसे जरूरी था।
असल में, यदि हम अपने सही-गलत को खुद समझने लगें तो जीवन की कई कठिन परिस्थितियों से बचा जा सकता है। और यदि कभी समझ कम पड़े, तो माँ-बाप के अनुभव और उनके प्रेम पर भरोसा करना चाहिए।
खासकर छोटी उम्र में लड़कियों के लिए सबसे जरूरी है अपनी पढ़ाई, अपने करियर और अपने भीतर के गुणों को मजबूत बनाना। जीवन में किसी भी उपलब्धि तक पहुँचने में परिवार जितना साथ दे सकता है, उतना कोई और नहीं दे सकता।
शायद यही वह सीख है, जो आने वाली पीढ़ी को समय रहते समझनी चाहिए।
संक्षेप में—समझ, शिक्षा और परिवार का विश्वास ही जीवन की सबसे बड़ी ताकत है।
@vandanavaani


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