भक्ति मार्ग की आधारशिला : यम और नियम

 भक्ति मार्ग की आधारशिला : यम और नियम

भारतीय दर्शन में भक्ति मार्ग को आत्मिक उन्नति का सहज और मधुर पथ माना गया है। किंतु इस मार्ग पर स्थिर और सफलतापूर्वक चलने के लिए कुछ आंतरिक अनुशासन आवश्यक होते हैं। योगदर्शन में वर्णित यम और नियम ऐसे ही साधन हैं, जो साधक के जीवन को शुद्ध, संतुलित और ईश्वराभिमुख बनाते हैं। इनके बिना भक्ति केवल भावनात्मक रह जाती है, स्थायी साधना का रूप नहीं ले पाती।

यम सामाजिक और नैतिक आचरण से जुड़े हुए हैं। इनमें पाँच तत्व आते हैं—

सत्य: विचार, वाणी और कर्म में सत्य का पालन।

अहिंसा: मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न देना।

ब्रह्मचर्य: इंद्रियों और वासनाओं पर संयम।

अस्तेय: जो अपना नहीं है, उसे न लेना, न चाहना।

अपरिग्रह: आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।

ये यम साधक के बाह्य जीवन को पवित्र बनाते हैं और उसके व्यवहार में करुणा, सरलता और संयम का विकास करते हैं।

नियम साधक के आंतरिक जीवन को संस्कारित करते हैं। इनमें भी पाँच अंग हैं—

शौच: बाह्य और आंतरिक पवित्रता।

संतोष: जो प्राप्त है उसमें संतुष्ट रहना।

तप: कठिनाइयों को सहते हुए साधना में स्थिर रहना।

स्वाध्याय: शास्त्रों का अध्ययन और आत्मचिंतन।

ईश्वरप्रणिधान: अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना।

यम और नियम कोई कठिन या असंभव साधना नहीं हैं। ये जीवन के छोटे-छोटे, सरल नियम हैं, जिन्हें दैनिक व्यवहार में उतारकर कोई भी व्यक्ति भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर हो सकता है। किंतु इन सबका मूल आधार है—ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण। जब इंद्रियाँ संयमित होती हैं, तभी मन स्थिर होता है और हृदय में भक्ति का दीप प्रज्वलित होता है।

इस प्रकार यम और नियम न केवल भक्ति मार्ग के साधन हैं, बल्कि वे जीवन को सार्थक, शुद्ध और ईश्वरमय बनाने की कुंजी भी हैं।

Dr Vandana Pandey

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