सफलता का मूल मंत्र : समर्पण

 सफलता का मूल मंत्र : समर्पण

मर्पण जीवन का वह दिव्य भाव है, जो साधारण प्रयासों को असाधारण उपलब्धियों में बदल देता है। यह केवल झुकने या त्याग करने का नाम नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य के प्रति पूर्ण निष्ठा और विश्वास का भाव है। जहाँ समर्पण होता है, वहाँ अहंकार, स्वार्थ, राग-द्वेष और घृणा स्वतः ही विलीन होने लगते हैं।

जीवन के हर क्षेत्र में –चाहे वह संबंध हों, साधना हो या लक्ष्य की प्राप्ति –समर्पण की आवश्यकता होती है। रिश्तों में समर्पण मधुरता लाता है, विश्वास को गहराता है और दूरियों को मिटाता है। स्वार्थ पर टिके संबंध समय के साथ टूट जाते हैं, किंतु समर्पण से निभाए गए रिश्ते समय की कसौटी पर और अधिक प्रगाढ़ हो जाते हैं।

लक्ष्य की प्राप्ति में समर्पण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब व्यक्ति मन, वचन और कर्म से अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित हो जाता है, तब बाधाएँ मार्ग बन जाती हैं। अधूरा प्रयास और संशयपूर्ण विश्वास सफलता को दूर कर देते हैं, जबकि पूर्ण समर्पण असंभव को भी संभव बना देता है।

समर्पण को यदि प्रकृति के उदाहरण से समझें, तो बीज इसका श्रेष्ठ प्रतीक है। बीज जब स्वयं को धरती की गोद में पूरी तरह समर्पित कर देता है, तभी उसमें अंकुरण होता है। सूर्य की किरणें उसे ऊर्जा देती हैं, पवन उसे स्नेह प्रदान करता है और मेघ उसका पोषण करते हैं। समर्पण के फलस्वरूप ही वह बीज एक विशाल वृक्ष बनता है, जो न केवल स्वयं फलता-फूलता है, बल्कि असंख्य जीवों को छाया और जीवन देता है।

यही नियम मानव जीवन पर भी लागू होता है। जब हम अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण और विश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं, तब संपूर्ण ब्रह्मांड हमारा सहयोगी बन जाता है। समर्पण ही वह सेतु है, जो प्रयास और सफलता के बीच की दूरी को मिटा देता है।

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वंदना पांडेय Adeo


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