आत्मसंयम: श्रेष्ठ जीवन की आधारशिला
आत्मसंयम वह शक्ति है जो मनुष्य को स्वयं पर शासन करना सिखाती है। जो व्यक्ति अपने विचारों, इच्छाओं और व्यवहार पर नियंत्रण रख सकता है, वही वास्तव में स्वतंत्र और सशक्त कहलाता है। बाहरी अनुशासन से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक अनुशासन होता है, और यही आत्मसंयम का सार है।
मनुष्य के जीवन में अधिकांश समस्याओं की जड़ उसकी अनियंत्रित इच्छाएँ और आदतें होती हैं। क्रोध, लोभ, मोह, भय और असंयमित वासनाएँ व्यक्ति की प्रगति में सबसे बड़ा अवरोध बनती हैं। आत्मसंयम इन सभी पर अंकुश लगाने का साधन है। जब इच्छाशक्ति और आत्मसंयम साथ-साथ चलते हैं, तब कठिन से कठिन लक्ष्य भी सहज प्रतीत होने लगते हैं।
इतिहास साक्षी है कि जितने भी महापुरुष हुए, उनके जीवन में आत्मसंयम एक प्रमुख गुण रहा। चाहे वह संत हों, विचारक हों या महान नेतृत्वकर्ता—सबने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि आत्मसंयम के बिना उत्कर्ष संभव नहीं। आत्मसंयमी व्यक्ति का स्वास्थ्य संतुलित रहता है, उसके रिश्तों में मधुरता होती है और उसका जीवन उद्देश्यपूर्ण दिशा में आगे बढ़ता है।
आत्मसंयम केवल त्याग नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने की कला है। यह जीवन को बोझिल नहीं, बल्कि रचनात्मक और सार्थक बनाता है। संयम का मार्ग व्यक्ति को कंकर से शंकर बनने की यात्रा पर ले जाता है—जहाँ साधारण मनुष्य भी असाधारण ऊँचाइयों को छू सकता है।
आज के भटकाव भरे युग में आत्मसंयम की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। यह हमें लक्ष्य से विचलित होने से बचाता है और सही पथ पर स्थिर बनाए रखता है। वास्तव में, आत्मसंयमी होना ही श्रेष्ठ व्यक्ति का प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है।
लेखिका
वंदना पांडेय (Adeo)


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