शिक्षक और समुदाय की अनूठी पहल सामुदायिक सहभागिता की मिसाल पेश किए सहभागिता से बनाया 150 मीटर लम्बा जालीदार अहाता/ samudayik sahbhagita ki mishal/jalidar ahata/ government primary school Garhkatara/

 *मुमकिन है*


शिक्षकों और समुदाय की अनूठी पहल- सामुदायिक सहभागिता से बनाया 150 लम्बा जालीदार अहाता वाया सोशल मीडिया



           हर साल हमें स्कूल में सुरक्षा घेरा तैयार करने मशक्कत करनी पड़ती थी। हर शिक्षा सत्र के आरंभ में पालकों और ग्रामवासियों के सहयोग से हम अस्थायी अहाता बनाते थे। इसी घेरे के अंदर हमारा किचन गार्डन, हर्बल गार्डन और वृक्षारोपण होता था। पूरे सत्र भर उसकी मरम्मत भी करनी होती पर जैसे ही गर्मी की छुट्टी लगती दीमक के कारण हमारा अहाता टूट जाता था और सारी हमारी मेहनत बेकार हो जाती। अगले सत्र फिर उतनी ही मेहनत। सबसे ज्यादा दुःख मुझे इस बात का होता कि हमारे सारे पेड़ पौधे जानवर खा जाते।  



    इन सबसे निजात पाने के दो ही तरीके थे पक्का अहाता या फेंसिंग करना। पक्के अहाते के लिए भी बहुत हाथ पैर मारे पर सफलता शून्य ही रहा। अब दूसरा तरीका था फेंसिंग करना। मैंने ठान लिया कि यह कार्य तो करना ही है।

        26 जनवरी 2020 का दिन था। स्कूल बिल्डिंग को लेकर गाँव वालों के प्रति मेरी नाराजगी भी थी। पालकों और गाँव वालों को खूब खरी खोटी सुनाई। इन बातों में एक बात अहाता की भी थी। तब मैंने उनके सामने एक शर्त रखी कि फेंसिंग के लिए सभी चीजों की व्यवस्था मैं करूँगा लेकिन लगाने की जिम्मेदारी आप लोगों की होगी। गांववाले मेरी बातों से सहमत दिखे और फिर शुरुआत हुई एक नई योजना को कार्यरूप में परिणीत करने की। खुद पर भी विश्वास था कि इतने रूपये तो मैं जुटा ही सकता हूँ।

        फिर लोगों से बात करने का सिलसिला शुरू हुआ। इसके लिए सोशल मीडिया (facebook, whatsup)को अपना हथियार बनाया। शिक्षक मित्रों और रिश्तेदारों के सामने फोन कॉल के जरिये अपनी बात रखी। लोगों का भरपूर सहयोग मिला और कुछ महीने में फेंसिंग के लिए पर्याप्त राशि एकत्रित हो गई। फिर कोरोना ने योजना को कुछ महीने पीछे धकेल दिया। फेंसिंग के बाद अब उसके लिए सीमेंट खंभे और कुछ मात्रा में रेंत, सीमेंट और गिट्टी की जरूरत थी। हमारे सरपंच जी के सहयोग से 60 खंभे और सीमेंट मिल गए। एक ख़ास मित्र ने 10 खम्भे का और सहयोग किया। हरियर सिंह और मोहन कँवर (दोनों पालक)ने रेंत और गिट्टी का सहयोग किया। 



          अब हमनें सप्ताह में 2 दिन निर्धारित किये। पहले दिन पूरे गांववालों के सहयोग से खम्भे गड़ाने का कार्य किया। इस कार्य में स्वसहायता समूह की  महिलाओं का विशेष योगदान रहा। एक हफ्ते बाद आज हम सबने फिर मिलकर स्थायी रूप से खम्भों में तार भी लगाकर स्थायी अहाता तैयार कर लिया।

     किसी भी कार्य के लिए एक ठोस रणनीति के साथ एक कार्ययोजना की आवश्यकता होती है।  इस मुश्किल से लगने वाले कार्य को सम्भव बनाने में सहयोग करने वाले मेरे सोशल मीडिया के दोस्तों, शिक्षक मित्रों, इष्ट जनों और मेरे गाँव के सभी लोगों को दिल से सलाम करता हूँ। एक बात तो है कि आप कोई कार्य करने की ठान लें तो वह देर सवेर पूरा होता ही है।

      गाँव और स्कूल की बेहतरी के लिए हमारा प्रयास निरन्तर जारी है। चलते चलते उन सभी सहयोगियों को आदर पूर्वक यह भी बताना चाहूँगा कि हमनें कुछ राशि बचा भी ली है जिसे आने वाले समय में किसी अन्य योजना पर खर्च होंगे। आज एक बार फिर आप सभी की बदौलत  गौरान्वित महसूस कर रहा हूँ.......

आभार आप सभी का।













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