संस्कृत कक्षा सातवीं अष्टम: पाठ: भोरमदेव:/भोरमदेव/BHORAMDEV

अष्टम:पाठ:
 भोरमदेव:
  



 छत्तीसगढ़ क्षेत्रस्य अनेकानि प्राचीन मंदिराणि ऐतिहासिक स्थलानि अद्यापि छत्तीसगढ़स्य समृद्धिं गौरवशाली परम्परा स्मारयन्ति । एवमेव एकं स्थानम् अस्ति , सः भोरमदेवः । कवर्धा जिलान्तर्गतं १६ किमी दूरे सतपुड़ा - विंध्याचल पर्वत - श्रेणीनां मध्ये प्रतिष्ठितः । अस्य मंदिरस्य वैशिष्ट्येन अयं छत्तीसगढ़स्य खजुराहो इति अभिधीयते । भोरमदेवस्य मंदिरं न केवल छत्तीसगढ़स्य अपितु सम्पूर्ण देशे ऐतिहासिक पुरातात्विक धार्मिक दृष्टया महत्वपूर्ण स्थलं अस्ति । वस्तुतः जनाः भोरमदेवं. गोंडजातीनाम् आराध्यदेवः इति मन्यन्ते । अस्मात् कारणात् अस्य मंदिरस्य नाम भोरमदेवः जातम् । इतिहासकार सर अलेक्जेण्डर कनिंध महोदयस्य अनुसारेण एतत् मंदिरं विष्णु मंदिरं आसीत् । कालान्तरे गाँडशासकै : पूर्वस्थापितं लक्ष्मीनारायणस्य प्रतिमां अपसार्य शिवलिङ्गं स्थापितम् । मंदिरे उत्कीर्ण लेखैः वास्तुकलाभिश्च परिलक्ष्यते , यत् मंदिरं इदम् एकादशे खीस्ताब्दे निर्मितम् । 

शब्दार्था : - स्थलानि = स्थान , अद्यापि आज भी , स्मारयन्ति = याद दिलाते हैं , प्रतिष्ठित : स्थित है , वैशिष्ट्येन - विशेषताओं के कारण , अयं = यह , अभिधीयते = कहा जाता है , अपितु बल्कि , जातम् हुआ , प्रतिमां मूर्ति , अपसार्य = हटाकर , उत्कीर्ण = उकेरे गये , परिलक्ष्यते देखते हैं । 

अनुवाद- छत्तीसगढ़ के कई प्राचीन मंदिर व ऐतिहासिक स्थल आज भी हमें छत्तीसगढ़ की समृद्धि , गौरवशाली परम्परा की याद दिलाते हैं । इनमें से एक स्थान है- भोरमदेव । यह कवर्धा से 16 किमी दूर सतपुड़ा और विंध्याचल पर्वत के मध्य स्थित है । इस मंदिर की विशेषताओं के कारण ही इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाता है । भोरमदेव का मंदिर न केवल छत्तीसगढ़ वरन्  सम्पूर्ण देश में ऐतिहासिक , पुरातात्विक और आध्यात्मिक ( धार्मिक ) दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है । वस्तुतः लोग भोरमदेव को गोंड जातियों का आराध्यदेव मानते हैं । इसी कारण इस मंदिर का नाम भोरमदेव पड़ा । 

इतिहासकार सर अलेक्जेण्डर कनिध महोदय के अनुसार यह मंदिर , विष्णु मंदिर था । कालान्तर में गोंड शासकों ने पूर्व स्थापित लक्ष्मी - नारायण की प्रतिमा के स्थान पर शिवलिंग स्थापित किये । मंदिर में उकेरे गए लेख और वास्तु कलाओं को देखें तो यह मंदिर 11 वीं सदी की बनी लगती है । 

नागरशैल्यां पूर्वाभिमुख मुख्यप्रवेशद्वारं अस्ति । अस्मिन मन्दिरे द्वारत्रयमस्ति । भोरमदेवस्य मन्दिरस्य निर्माणे खजुराहो उड़ीसाया : कोणार्क स्थित सूर्यमन्दिरस्य वास्तुशिल्पस्य अनुकृतिः परिलक्ष्यते । मंदिरस्य गर्भगृहे गरुड़ स्थित भगवतः विष्णोः प्रतिमा , पंचमुखी नागः , नृत्यतः गणपतेः , अष्टभुज प्रतिमाश्च सन्ति । गर्भगृहे मुख्यतः शिवलिङ्गमेव मण्डितमटित । मंदिरं निकषा उमामहेश्वर - काल - भैरव - द्विभुज - सूर्य प्रतिमाः शिव प्रतिमाश्च सन्ति । मन्दिरस्य उत्तर दिशि एकः विशालः सुरवोरोऽपि अस्ति । भोरमदेवस्य समीपे अन्येषु दर्शनीय स्थलेषु चौरग्रामस्य निकटे आयताकारं पाषाणनिर्मितं मण्डलामहल अस्ति । 

शब्दार्था : - पूर्वाभिमुख पूर्व दिशा की ओर , अनुकृतिः प्रतिरूप ( नकल ) , प्रतिमा : मूर्तियाँ , निकषा निकट , सुखोरोऽपि जलाशय भी , पाषाण निर्मितम् पत्थरों से बना ।

अनुवाद- नागर शैली में निर्मित पूर्व दिशा की ओर एक मुख्य प्रवेश द्वार है । इस मन्दिर में तीन द्वार ( दरवाजे ) हैं । भोरमदेव मन्दिर का निर्माण उड़ीसा के खजुराहो के कोणार्क सूर्यमंदिर के वास्तुकला का प्रतिरूप ( नकल ) प्रतीत होता है । मंदिर के गर्भगृह में गरुड़ पर विराजमान भगवान विष्णु की प्रतिमा , पाँच मुख वाले नाग , नृत्य करते गणपति जी और अष्टभुजी प्रतिमा हैं । गर्भगृह में शिवलिंग विशेष रूप में स्थापित है । मन्दिर के निकट शिव - पार्वती , काल भैरव , द्विभुज सूर्य प्रतिमा और शिव जी की प्रतिमा ( मूर्ति ) हैं । मन्दिर के उत्तर दिशा में एक विशाल जलाशय है । भोरमदेव के निकट अन्य दर्शनीय स्थलों में चौरग्राम के समीप आयताकार पत्थरों से बना मण्डला महल है ।


 चौरग्रामस्य समीपे इष्टिकापाषणेन निर्मितं एकं मन्दिरं ' छेरकी महलं ' इति नाम्ना ख्यातम् । अस्य मंदिरस्य समीपे नैकापि अजास्ति तथापि मंदिरस्य गर्भगृहे अजायाः शरीरेण निसृतं गंध जनाः अनु भवन्ति । एतदेव अस्य मंदिरस्य वैशिष्टयम् अस्ति ।

 पावसवसंतयोः काले हरीतिमाच्छादित पर्वत श्रृंखला नाम् अंके स्थित भोरमदेवस्य मंदिरं अस्ति । अस्य मोहक दृश्यानि वीक्ष्य जनाः आश्चर्याणवे निमञ्जन्ति । प्रतिवर्षे चैत्र त्रयोदशम्यां तिथौ अत्र त्रीन् दिवसान् पारम्परिक मेलापकः आयोज्जयते । पर्यटन विकासाय दृष्ट्या अयं मेलापक : शासनेन ‘ भोरमदेव महोत्सव ' इति नाम्ना समायोज्यते । “ धन्यो भोरमदेव शिवमस्तु "

शब्दार्था : - इष्टिकापाषाणेन- ईंट पत्थर से , निर्मितं -बना , ख्यातम् प्रसिद्ध है , अजा -बकरी , निसृतं- निकलने वाली , वीक्ष्य- देखकर , निमज्जन्ति- डूब जाते हैं , आश्चर्याणवे = आश्चर्य के समुद्र में , शिवमस्तु- शुभ हो ।

अनुवाद - चौरग्राम ( चोरगाँव ) के निकट ईंट - पत्थर से बना एक मंदिर है , जो छेरकी महल के नाम से प्रसिद्ध है । इस मंदिर के पास एक भी बकरी नहीं है तब भी मंदिर के गर्भगृह में बकरी के शरीर से निकलने वाली गंध का अनुभव करते हैं । यही इस मन्दिर की विशेषता है । वर्षा और बसंत ऋतुओं में भोरमदेव मंदिर की ये पर्वत मालाएँ ( पर्वत की चोटियाँ ) हरीतिमा से ढँक जाती हैं । इस मनमोहक दृश्य को देखकर लोग आश्चर्य के सागर में डूब जाते हैं । यहाँ प्रत्येक वर्ष चैत्र त्रयोदशी ( चैत तेरस ) को त्रिदिवसीय ( तीन दिनी ) पारम्परिक मेला का आयोजन होता है । पर्यटन के विकास की दृष्टि से शासन इसे ( इस मेला को ) ‘ भोरमदेव महोत्सव ' के नाम से आयोजित करता है । “ धन्य है - "भोरमदेव , तुम्हारा शुभ हो"

प्रश्न 1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए

( क ) छत्तीसगढ़स्य खजुराहो किम् अस्ति ? 

उत्तर- छत्तीसगढ़स्य खजुराहो भोरमदेवः अस्ति । 

( ख ) कस्य प्रतिमाम् अपसार्य शिवलिङ्ग प्रतिष्ठितम् ?

 उत्तर- लक्ष्मीनारायणस्य प्रतिमा अपसार्य शिवलिङ्ग प्रतिष्ठितम् ।

( ग ) कस्यां शैल्याम् पूर्वाभिमुखमुख्यप्रवेशद्वारम् अस्ति ? 

उत्तर - नागर शैल्यां पूर्वाभिमुखमुख्यप्रवेशद्वारम् अस्ति । 

( घ ) ' मण्डला महलम् ' कुत्र निर्मितम् अस्ति ?

 उत्तर- चौरग्रामस्य निकटे मण्डला महलम् निर्मितम् अस्ति । 

( ङ ) इष्टिकापाषाणनिर्मितं मन्दिरं केन् नाम्ना ख्यातम् ?

 उत्तर- इष्टिकापाषाणनिर्मितं मन्दिरं ' छेरकी महलम् ' नाम्ना ख्यातम् । 

( च ) भोरमदेव : मेलापकः कस्यां तिथौ आयोज्यते ?

 उत्तर- भोरमदेव मेलापकः चैत्र त्रयोदशस्यां तिथौ आयोज्यते । 

प्रश्न 2. युग्म कीजिए

( 1 ) भोरमदेव : -छत्तीसगढ़स्य खजुराहो

( 2 ) नागर शैल्याम्-प्रवेशद्वारं

( 3 ) गर्भगृहे -शिवलिङ्गम्

( 4 ) विशाल सरोवर :-उत्तर दिशि

( 5 ) अजा -गंधम्

( 6 ) अयताकारं पाषाणनिर्मितम्-मण्डला महलं

प्रश्न 3. संस्कृत में अनुवाद

( क ) यहाँ अनेक मन्दिर हैं ।

अनुवाद- अत्र अनेकाः मन्दिराणि सन्ति ।

( ख ) भोरमदेव एक दर्शनीय स्थल है । 

अनुवाद- भोरमदेवः एकं दर्शनीय स्थानं अस्ति ।

( ग ) इस मंदिर में तीन द्वार हैं ।

 अनुवाद- अस्मिन मन्दिरें द्वारत्रयम् अस्ति ।

( घ ) गर्भगृह में शिवलिङ्ग है ।

अनुवाद- गर्भगृहे शिवलिङ्ग अस्ति । 

( ङ ) चैत्रमास में मेला लगता है

अनुवाद - चैत्र मासे मेलापकः आयोज्यते । 

प्रश्न 4 ( क ) अकारान्त ' देव ' शब्द की कारक रचना सभी विभक्तियों में लिखिए । 

उत्तर- ' देव ' अकारान्त पुल्लिंग शब्द 

  एकवचन द्विवचन बहुवचन्

 प्र . देवः देवौ देवा : 

द्वि . देवम् देवौ देवान्

तृ . देवेण देवाभ्याम् देवैः

च . देवाय देवाभ्याम् देवेभ्यः 

पं . देवात् देवाभ्याम् देवेभ्यः देवस्य देवयोः 

ष . देवाणाम् देवे देवयोः 

स . देवेषु सं . हे देव ! हे देवौ ! हे देवा !

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