शीर्षक यात्रा वृतांत ""सतपुड़ा की रानी ""

 शीर्षक यात्रा वृतांत ""सतपुड़ा की रानी ""

पांच पहाड़ियों से घिरी सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी राज्य आनंद संस्थान की पूरी टीम की अनूठी पहल के कारण एक बार फिर से इस सुरम्य सौम्य सुंदर रानी को एक बार फिर समीप से निहारने का अवसर प्राप्त हुआ इस रानी का श्रृंगार वाकई मन को मुदित कर देता है काले काले पहाड़ मानो जैसे इसके केश हो इन पहाड़ों की चट्टानों में अटके छोटे छोटे गोल पत्थर जो प्रतीक है इस बात का की कभी यह भाग पानी से भरा था ऐसे प्रतीत होते हैं मानो इसके काले केशो को मोती और मणियों से सुसज्जित करते हो घनघोर घने हरे हरे आंखों को खोलने वाले हरे हरे सदाबहार बन मानो जैसे कोई सुसज्जित वस्त्र हो इन वृक्षों पर कुछ बलखाती कुछ लटकती लताएं जिन पर कही नीले तो कही छोटे छोटे लाल तो कही पीले पुष्प मानो इस सतपुड़ा की रानी के आभूषण है अत्यंत सुंदर मनोरम दृश्य पचमढ़ी हिल्स का सूर्योदय ये सीखाता हुआ उदय हुआ कि हमें हमेशा जीवंत रहना चाहिए चाहे समय कैसा भी हो हमेशा अपनी लालिमा के साथ जैसे सूर्य अपनी लालिमा के साथ उदय होता है वैसे ही हम भी जागृत रहे अपने उत्साह के साथ धूपगढ़ के सूर्यास्त को देखकर ऐसा लगा कि कोई भले ही कहे कि उगते हुए सूरज को सभी प्रणाम करते है और डूबते हुए को कोई प्रणाम नहीं करता पर ऐसा नहीं h यहां तो डूबते हुए सूर्य को दिखने के लिए इतना बड़ा जन समूह एकत्र था तो डूबते हुए सूर्य का भी महत्व है यदि डूबेगा नहीं तो उदय भी नहीं होगा अर्थात यदि सफल होना है तो असफलता जीवन का सौंदर्य है और सफलता जीवन का शिखर! बी फॉल का मनोरम दृश्य एक दूसरे को आच्छादित किए घने घने वन  चट्टानों के ऊपर से गिरता सफेद दूधिया जल धारा जिसको देखकर कक्षा 6या 7में पढ़ी हुई कवि वर भवानी प्रसाद मिश्र की कविता याद आ गई! सतपुड़ा के घने जंगल ऊंघते अनमने जंगल झाड़ ऊंचे और नीचे चुप खड़े हैं आंख मिचे घास चुप है कास चुप है मूक शाल पलाश चुप है बन सको तो ध सों इनमें धस ना पाती हवा जिनमें सतपुड़ा के घने जंगल ऊंघते अनमने जंगल! पांडव ग़ुफ़ाओ का मनोहारी दृश्य शाम का समय चारों ओर रंग बिरंगे फूलों से सजा अपनी अनुपम छठा बिखरता रंग बिरंगा गार्डन जिसको देखकर किसी के होठों पर भी गुलाब जैसी सुंदर मुस्कान बिखर जाए पत्तों का चरमराता हल्की पवन के साथ सुर मिलाता संगीत ने मानो एक पल के लिए ऐसा मंत्र मुग्ध किया कि सारा मन बस प्रकृति के बीच कही खो गया और लगा कि जीवन तो बस यहीहै और मुझे लगा कि मैं जीवित हूं दिल से  सच में चौरा गढ़ की 1365सीढ़ियां चढ़ने के बाद ये समझ आया कि लक्ष्य हमेशा कड़ी मेहनत से ही प्राप्त होता है जैसे महादेव इतनी सारी सीढ़ियां चढ़ने के बाद प्राप्त हुए  बड़ा महादेव तक जाते ही प्राकृतिक जल के जो फुहार पड़ी पैरों पर तो चढ़ाई की सारी थकावट गायब हो गई और इस प्राकृतिक जल ने मानो दर्द में मरहम का काम किया पूर्ण शांति सफलता का अनुभव मन को विभोर कर रहा था और एक समय तो मन हुआ कि यही रह जाऊ इस सुंदर प्रकृति की छांव में पर वापस आने का समय हो गया था तो अंदर से मन की शांति के साथ पचमढ़ी से वापस आना हुआ इस यात्रा पर खुद के साथ पर्याप्त समय मिला खुद को और जानने का अवसर मिला और दूसरे कुछ साथियों को भी जानने समझने का अवसर प्राप्त हुआ ये सच में एक ऐसा आनंद है जिसकी स्मृतियां मेरे मानस पटल पर चिर स्थाई रहेंगी और जब भी मैं इन्हें याद करूंगी तो सच में अंदर से स्वयं को आनंदित भास करूंगी इसके लिए राज्य आनंद संस्थान की पूरी टीम आदरणीय सत्य प्रकाश सर, प्रवीण जी गंग राणे सर, देवाशीष सर, मनु सर,  आदरणीय कमलेश प्रसाद तिवारीजी,केसरी भैया, विजय भाई, मोहित भैया, राजेश पटेलजी , मयंक पटेल, आदित्य यादव, अभिषेक शर्मा, श्रद्धा गुप्ता,  पल्लवी,सुष्मिता जी, प्रिया का बहुत बहुत धन्यवाद और एक विशेष धन्यवाद आदरणीय ओमप्रकाश सर का जिन्होंने इतने प्रेम सौहाद्र और समर्पण के साथ पचमढ़ी की सभी स्थानों को घुमाया और साथ ही बारीकी से एक एक चीज की विशेषता बताई आप सभी का हृदय से आभार! 

काव्यांजलि शर्मा, काव्य योग इंस्ट्रक्टर एवं हॉलिस्टिक कोच गुना मध्य प्रदेश

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