“मैं से हम तक की यात्रा”

 “मैं से हम तक की यात्रा”

राजीव और सविता एक ही कक्षा में पढ़ते थे, पर दोनों की सोच में बड़ा अंतर था। राजीव अपने मध्यावकाश का भोजन अकेले करना पसंद करता था। उसे लगता था कि जो उसका है, वही उसका संसार है। कोई देखे, बाँटे या पूछे—यह सब उसे अनावश्यक लगता था।

सविता ठीक इसके विपरीत थी। वह कभी भी अपना भोजन केवल अपने लिए नहीं रखती थी। यदि किसी दिन उसका टिफिन न भी आता, तो वह पास बैठे भाई-बहनों के साथ खुशी-खुशी भोजन बाँट लेती। उसके लिए भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं था, बल्कि अपनापन बाँटने का अवसर था।

एक दिन किसी ने सविता से पूछा, “तुम अपना खाना सबको क्यों खिलाती हो?”

सविता मुस्कुराकर बोली, “अकेले खाने से पेट भरता है, लेकिन मिलकर खाने से मन।”

कक्षा में भी यही अंतर दिखाई देता था। सविता अपनी किताबें बाँटती, दूसरों की चिंता करती और सबके साथ आगे बढ़ने में विश्वास रखती। इसलिए शिक्षक भी उसकी प्रशंसा करते थे। वहीं राजीव केवल अपने ‘मैं’ में उलझा रहता—मेरी किताब, मेरा काम, मेरी चिंता।

समय के साथ राजीव ने देखा कि सविता के चेहरे पर संतोष है, मित्रता है और सम्मान भी। तब उसे समझ आया कि जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है। जब हम दूसरों के साथ जुड़ते हैं, उनका ध्यान रखते हैं, तभी सच्चा सुख मिलता है।

निष्कर्ष

“मैं” का भाव हमें सीमित करता है, जबकि “हम” का भाव हमें विशाल बनाता है। जब हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर एक-दूसरे के लिए सोचते हैं, तभी जीवन में आनंद, शांति और सच्चा सुख आता है।

Dr. Vandana Pandey 

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