अब और मत सहो!
हमने सहना अपनी आदत बना लिया है।
गलत बातों को अनदेखा कर देना,
अपमान को चुपचाप भीतर उतार लेना,
और हर बार खुद को ही समझा लेना —
“छोड़ो, जाने दो…”
पर सच यह है कि हर बार सह जाना कोई महानता नहीं।
कई बार यह अपने ही अस्तित्व के साथ अन्याय होता है।
जब आप बार-बार चुप रहते हैं,
तो लोग मान लेते हैं कि आपको फर्क नहीं पड़ता।
आपकी ख़ामोशी को वे आपकी कमजोरी समझ बैठते हैं,
और आपकी सहनशीलता को अपना हक़।
सहन करना और धैर्य रखना एक बात नहीं है।
धैर्य तब तक सुंदर है
जब तक आपकी इज़्ज़त, आत्मसम्मान और सपने सुरक्षित हैं।
लेकिन जहाँ आपकी पहचान मिटने लगे,
वहाँ चुप रहना समझदारी नहीं, मजबूरी बन जाती है।
अब समय है खुद के लिए खड़े होने का।
हर बात पर “हाँ” कहना बंद करो।
हर अन्याय पर मुस्कराना बंद करो।
हर बार खुद को छोटा साबित करना बंद करो।
अपनी सीमाएँ तय करो।
अपनी आवाज़ को दबने मत दो।
गलत के सामने डटकर खड़े होना सीखो।
क्योंकि जो व्यक्ति अपने लिए नहीं बोलता,
दुनिया उसे दबाने में देर नहीं लगाती।
याद रखो —
आप पत्थर नहीं हैं जो हर वार सह लें।
आप एक इंसान हैं, आपकी भी एक मर्यादा है।
आज खुद से एक वचन लो —
जो आपकी अहमियत नहीं समझता,
उसके लिए खुद को कम मत आँको।
अब और मत सहो…
खुद को महत्व देना शुरू करो।


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